जातिगत जनगणना: सामाजिक न्याय या राजनीतिक समीकरण?
संपादकीय-
3 मई 2025
*जातिगत जनगणना: सामाजिक न्याय या राजनीतिक समीकरण?*
भारत में एक बार फिर जातिगत जनगणना को लेकर बहस तेज हो गई है। मोदी सरकार द्वारा हाल ही में की गई जाति जनगणना की घोषणा ने राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब भारत-पाक संबंध तनावपूर्ण हैं और देश गंभीर सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। इसके बावजूद, सरकार द्वारा अचानक इस मुद्दे को उठाया जाना संकेत देता है कि इसका उद्देश्य महज सामाजिक संतुलन नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति भी हो सकता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
1931 के बाद पहली बार जातियों की व्यापक गणना करने का प्रस्ताव एक ऐतिहासिक कदम है। आज़ादी के बाद की जनगणनाओं में अनुसूचित जातियों और जनजातियों को छोड़कर अन्य जातियों का आंकड़ा कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। पंडित नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी तक, कांग्रेस नेतृत्व ने जातिगत गणना को राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा माना। लेकिन बदलते राजनीतिक परिवेश में यह मुद्दा अब सामाजिक न्याय के प्रतीक के रूप में उभारा जा रहा है।
जातिगत जनगणना की मांग करने वाले राजनीतिक दलों – कांग्रेस, सपा, द्रमुक, राजद आदि – का तर्क है कि 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' के सिद्धांत पर संसाधनों और अधिकारों का बंटवारा होना चाहिए। यह तर्क सामाजिक न्याय के सिद्धांत से मेल खाता है, लेकिन इसके पीछे राजनीतिक लाभ का उद्देश्य भी निहित है। जातिगत आंकड़ों के आधार पर आरक्षण और नीतियों को संशोधित करने की मांग की जा रही है, जबकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 50% आरक्षण की सीमा तय की जा चुकी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सिर्फ जाति की गिनती भर से सामाजिक विषमता दूर की जा सकेगी?
वास्तव में, जातिगत जनगणना कई स्तरों पर चुनौतीपूर्ण है। एक ओर जहां यह सामाजिक संरचना की वास्तविकता को सामने लाने का माध्यम बन सकती है, वहीं दूसरी ओर यह सामाजिक विभाजन को और गहरा भी कर सकती है। इसके अलावा, प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी यह कार्य जटिल और समयसाध्य है। पहले से लंबित 2021 की जनगणना अभी तक शुरू नहीं हो पाई है। कोविड महामारी, चुनावों और अन्य राजनीतिक प्रक्रियाओं के कारण देरी पहले ही हो चुकी है।
जातिगत जनगणना के संभावित लाभ भी कम नहीं हैं। यह शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, और कल्याणकारी योजनाओं को बेहतर ढंग से लक्षित करने में मदद कर सकती है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि कौन-से वर्ग आज भी वंचना और भेदभाव के शिकार हैं और किसे सशक्तिकरण की अधिक आवश्यकता है। इसके आधार पर सरकारें नीति निर्माण में अधिक सटीकता और पारदर्शिता ला सकती हैं।
फिर भी यह अनदेखा नहीं किया जा सकता कि चुनावी मौसम में इस तरह की घोषणाएं अक्सर वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित होती हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि जातिगत जनगणना को राजनीतिक हथियार के बजाय सामाजिक विकास और समावेशन के औजार के रूप में देखा जाए।
जातिगत जनगणना का विचार यथार्थवादी और दूरदर्शी नीतियों की मांग करता है। इसे केवल चुनावी एजेंडे का हिस्सा बनाना समाज के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है। यदि सरकार वास्तव में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना चाहती है, तो इसे पारदर्शिता, समावेशिता और संवेदनशीलता के साथ लागू करना होगा, न कि केवल राजनीतिक लाभ के लिए।
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