रिश्ते: भावनाओं का व्यापार नहीं, दिलों की पूँजी हैं

संपादकीय 
8 मई 2025
*"रिश्ते: भावनाओं का व्यापार नहीं, दिलों की पूँजी हैं* 
वर्तमान समय में रिश्तों की परिभाषा बदलती नज़र आ रही है। जहाँ पहले रिश्तों की बुनियाद में प्रेम, समर्पण और निस्वार्थ भाव होता था, वहीं अब बहुत से लोग उन्हें लाभ और हानि के तराजू में तोलने लगे हैं। यह चिंताजनक है, क्योंकि जिन रिश्तों में भावना की जगह गणना आ जाए, वे कभी गहरे नहीं हो सकते। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

एक सच्चा रिश्ता वही होता है जो सुख-दुख दोनों में साथ निभाए, बिना किसी अपेक्षा के। दोस्ती हो, परिवार का नाता हो या जीवनसाथी का संबंध—यदि उसमें सिर्फ ‘मुझे क्या मिलेगा’ की सोच आ जाए, तो वह रिश्ता भावनाओं से अधिक एक सौदे में बदल जाता है।
रिश्तों की सबसे बड़ी विशेषता है—निरंतर प्रयास। जैसे एक पौधे को रोज़ पानी, धूप और देखभाल चाहिए, वैसे ही रिश्तों को भी समय, संवाद और स्नेह चाहिए। जब आप किसी से संवाद करना बंद कर देते हैं, जब मेलजोल में दूरी आने लगती है, तब धीरे-धीरे वो रिश्ता टूटने लगता है। और जब रिश्ता टूटता है, तो केवल लोग नहीं बिछड़ते—बल्कि दिलों में खालीपन बस जाता है।
इसलिए जरूरी है कि:
रिश्तों में कर्तव्य और प्रेम की समझ हो।
हम सिर्फ अधिकार न जताएँ, बल्कि अपना फ़र्ज़ भी निभाएँ।
कभी सामने वाले की गलती को क्षमा कर दें, तो कभी अपनी गलती स्वीकार भी करें।
सिर्फ सुनाएँ नहीं, सुनें भी।
रिश्तों में सबसे सुंदर पहलू होता है सामंजस्य। यदि समय के साथ रिश्तों का स्वरूप बदले भी, तो उसे नकारात्मकता से नहीं देखना चाहिए। परिवर्तन को समझना, स्वीकारना और उसके अनुरूप खुद को ढालना—यही रिश्तों की सच्ची परिपक्वता है।
रिश्ते केवल खून के नहीं होते, वे विश्वास के होते हैं।
अगर हम समय, प्रेम और सम्मान से किसी भी संबंध को सँवारें, तो वह रिश्ता जीवन का सबसे सुंदर सहारा बन जाता है। वहीं, उपेक्षा, स्वार्थ और संवादहीनता—रिश्तों को धीरे-धीरे ख़त्म कर देती है।
रिश्ते कोई व्यापार नहीं हैं, जहाँ हिसाब रखा जाए। ये तो एक आत्मिक गठबंधन हैं, जो केवल समर्पण, समझ और स्नेह से टिकते हैं।
इसलिए—रिश्तों को समय दें, मन से निभाएँ और दिल से सजाएँ। तभी जीवन वास्तव में आनंदमय बनता है।
"रिश्ते बोझ नहीं होते, बस उन्हें निभाने का तरीका समझना होता है।"

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