सीमाएं जब सुलगती हैं, तो शांति की तपिश भी झुलसने लगती है

संपादकीय 
9 मई 2025
 *"सीमाएं जब सुलगती हैं, तो शांति की तपिश भी झुलसने लगती है"* 

भारत, एक विशाल लोकतांत्रिक राष्ट्र, जिसकी सीमाएं भौगोलिक रूप से विविधताओं से भरी हैं—उत्तर में हिमालय की बर्फ़ से लेकर दक्षिण में समुद्री तटों तक फैली हुई हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इन भौगोलिक सीमाओं की सुंदरता के बीच, तनाव की रेखाएँ भी बार-बार खिंचती रही हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

वर्तमान परिदृश्य में, भारत की पश्चिमी सीमा (पाकिस्तान) और उत्तर-पूर्वी सीमा (चीन) लगातार भू-राजनीतिक तनावों का केंद्र बनी हुई हैं। पाकिस्तान प्रायः सीमा पार आतंकवाद, संघर्ष विराम के उल्लंघन और अस्थिरता फैलाने वाली गतिविधियों में संलिप्त पाया गया है। वहीं, चीन के साथ लद्दाख सीमा पर एलएसी (LAC) को लेकर चल रहे गतिरोध और बढ़ते सैन्य निर्माण ने दोनों देशों के बीच अविश्वास की दीवार और मजबूत कर दी है।
इन तनावों का सीधा प्रभाव न केवल सीमावर्ती नागरिकों पर पड़ता है, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और वैश्विक रणनीति पर भी गहरा असर डालता है। जब सैनिक सीमाओं पर तनकर खड़े होते हैं, तब पूरा देश उनके कंधों पर निर्भर होता है, लेकिन यह भी आवश्यक है कि कूटनीति, संवाद और रणनीतिक धैर्य से समस्याओं का समाधान खोजा जाए।
भारत की नीति सदैव "शांति के साथ शक्ति" की रही है।
ना तो भारत किसी देश की संप्रभुता का उल्लंघन करता है, और ना ही किसी भी प्रकार की आक्रामकता को स्वीकार करता है। यही कारण है कि भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद सुलझाने के लिए कूटनीतिक स्तर पर निरंतर प्रयास करता रहा है—चाहे वह द्विपक्षीय वार्ता हो, सैन्य कमांडर स्तर की बैठकें हों, या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बात रखने का सशक्त तरीका।
परंतु, एक और सच्चाई यह भी है कि शांति की पहल तब तक सार्थक नहीं होती जब तक सामने वाला पक्ष ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ आगे न बढ़े। चीन द्वारा बार-बार सीमा पर अतिक्रमण प्रयास और समझौतों का उल्लंघन, और पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को समर्थन—इन दोनों ही परिस्थितियों ने भारत की रक्षा रणनीति को सतर्क और सुदृढ़ बनाने को बाध्य किया है।

 *समाधान की राह क्या है?* 
1. कूटनीतिक दबाव: अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और वैश्विक मंचों पर प्रभावी भूमिका निभाकर भारत को अपने हितों की रक्षा करनी होगी।
2. रक्षा सुदृढ़ीकरण: सीमाओं पर बुनियादी ढांचे, तकनीकी निगरानी और सैन्य तैनाती को और मजबूत करना अनिवार्य है।
3. स्थानीय सहयोग: सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों के लिए शिक्षा, रोज़गार और सुरक्षा की व्यवस्था करना, ताकि वे राष्ट्र की सुरक्षा में सहयोगी बन सकें।
4. वैचारिक संयम: देश में उग्र राष्ट्रवाद के स्थान पर विवेकपूर्ण देशभक्ति का संचार आवश्यक है, जिससे आंतरिक एकता मज़बूत बनी रहे।
सीमाओं पर बना तनाव केवल ज़मीन का संघर्ष नहीं होता, यह विश्वास, प्रतिष्ठा और रणनीति का भी युद्ध होता है। भारत को चाहिए कि वह एक ओर संयम और संवाद से शांति की राह बनाए रखे, वहीं दूसरी ओर अपनी रक्षा नीति को इतना सक्षम बनाए कि कोई भी राष्ट्र भारत की संप्रभुता की ओर आँख उठाने से पहले सौ बार सोचे।
क्योंकि जब सीमाएं सुलगती हैं, तब सिर्फ़ बंदूकें नहीं बोलतीं—बल्कि एक राष्ट्र की आत्मा भी आंदोलित हो उठती है।

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