सिंदूर की सियासत और राष्ट्रवाद का रंगमंच

संपादकीय 
3 जून 2025 गुरुग्राम होटल।
 *सिंदूर की सियासत और राष्ट्रवाद का रंगमंच* 

‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत की सैन्य ताकत और रणनीतिक दृढ़ता का परिचायक है। लेकिन जब यह राष्ट्रनीति से अधिक राजनीति का औजार बनने लगे, तो विमर्श जरूरी हो जाता है। यह एक ऐसा दौर है, जहां देशभक्ति और दलभक्ति के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। ऐसे में आवश्यक है कि सेना की वीरता को राजनैतिक रंग से परे रखा जाए और देश की सुरक्षा नीतियों पर गहराई से विचार हो — संसद में भी और समाज में भी। इसलिए यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

राजनीति में प्रतीकों का बड़ा महत्व होता है। कभी चाय, कभी टोपी, कभी झाड़ू और अब ‘सिंदूर’। हाल ही में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने भारत की सैन्य ताकत और रणनीतिक साहस का परिचय तो दिया ही, लेकिन उससे कहीं अधिक इसने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। जब आतंक के अड्डों पर कार्रवाई होती है, तो यह केवल सुरक्षा नीति का हिस्सा नहीं होता — यह भावनाओं का विस्फोटक केंद्र भी बन जाता है। और भारतीय राजनीति तो इन भावनाओं की प्रयोगशाला रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के कोने-कोने में जनसभाएं कर रहे हैं, और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का बखान हर मंच से गूंज रहा है। वहीं विपक्ष — खासकर कांग्रेस, तृणमूल और वामपंथ — इस पूरे ऑपरेशन को राजनीतिक ढोंग करार दे रहा है। उनकी आपत्ति है कि सरकार ने देश को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग छोड़ दिया, जबकि पाकिस्तान के साथ चीन, तुर्किये और अजरबैजान जैसे देश खड़े रहे।
यह आरोप और प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं। लेकिन मूल प्रश्न यह है — क्या हम सेना और सरकार को अलग-अलग देखने का जोखिम उठा सकते हैं? क्या भारतीय सेना बिना राजनीतिक निर्देश के कार्य करती है? नहीं। सरकार ही सेनाओं की नीति तय करती है, लक्ष्य निर्धारित करती है और रणनीतिक दिशा देती है। ऐसे में विपक्ष द्वारा यह कहना कि “हम सेना के पराक्रम के साथ हैं, लेकिन सरकार से सवाल करते हैं,” एक राजनीतिक चालाकी से ज़्यादा कुछ नहीं लगता।

अब विपक्ष संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग कर रहा है। मांग लोकतांत्रिक है, अनुचित नहीं। लेकिन क्या केवल सियासी सवालों के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाना व्यवहारिक है? जब मीडियाई मंचों और जनसभाओं में वही बातें कही जा रही हैं, तो संसद में क्या नया होगा? और फिर, यह भी ध्यान देना होगा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ अभी जारी है — ऐसे में क्या तत्काल विश्लेषण और विमर्श संभव है?
भाजपा अब इस सैन्य सफलता को राजनीतिक पूंजी में बदलने के प्रयास में जुट गई है। 9 जून से पार्टी ‘सिंदूर’ को केंद्र में रखकर एक बड़ा अभियान शुरू कर रही है। घर-घर जाकर महिलाओं को सिंदूर भेंट किया जाएगा, वीरता की कहानियाँ सुनाई जाएंगी, शॉर्ट फिल्में दिखाई जाएंगी और मोदी सरकार की योजनाओं का प्रचार किया जाएगा।
यहां प्रश्न उठता है — क्या सिंदूर, जो भारतीय नारी के जीवन का पवित्र प्रतीक है, उसे राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाना उचित है? क्या यह भारतीय परंपरा के उस भावात्मक पक्ष का राजनीतिक बाज़ारीकरण नहीं है?
राजनीति में राष्ट्रवाद कोई नया औज़ार नहीं है, लेकिन जब राष्ट्रवाद भावनात्मक उन्माद में बदल जाए, तब चिंतन आवश्यक हो जाता है। विपक्ष अपनी आलोचनाओं के पक्ष में इतिहास के पन्ने पलटता है — नेहरू की गलतियाँ, इंदिरा गांधी की विफलताएँ — लेकिन यह भी सच है कि इतिहास अब वोट नहीं दिलाता। आज का मतदाता वर्तमान से सवाल करता है — उसे न सिंधु घाटी चाहिए, न तुग़लक दरबार।
इस पूरे प्रसंग में भाजपा ने यह भी तय किया है कि 'ऑपरेशन सिंदूर' में शामिल मंत्रालयों और विभागों के परिजनों को विशेष शॉर्ट फिल्म दिखाई जाएगी — एक भावनात्मक जोड़, जिसे सियासत में "वीर रस" की राजनीति कहा जा सकता है।

भारत की सेना का साहस और पराक्रम हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है, लेकिन उसका उपयोग वोट की राजनीति में एक ‘ब्रांड’ के तौर पर किया जाए, तो यह राष्ट्रनीति के साथ न्याय नहीं करता। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर विमर्श ज़रूरी है, लेकिन वह विमर्श राष्ट्रहित से प्रेरित हो, न कि केवल चुनावी रणनीतियों से। ‘सिंदूर’ सिर पर सजता है, राजनीति में नहीं। राष्ट्रभक्ति और दलभक्ति के बीच की लकीर बहुत बारीक है — उसे मिटाना भारतीय लोकतंत्र को भारी पड़ सकता है।

Comments

Popular posts from this blog

संवैधानिक इस्तीफा या मजबूरी का मंथन – उपराष्ट्रपति धनखड़ का कदम और लोकतंत्र की गूंज

"भोजन की थाली में हमारी सभ्यता का आईना"

पचेरी की बहू नीलम सोनी ने अंग्रेजी विषय में किया नेट जेआरएफ क्वालिफाइड।