गरीबी के बदलते आयाम: आंकड़ों से नीतियों तक की यात्रा
संपादकीय
12 जून 2025
*"गरीबी के बदलते आयाम: आंकड़ों से नीतियों तक की यात्रा* "
भारत के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में गरीबी का मुद्दा दशकों से केंद्र में रहा है, लेकिन अब गंभीर चिंतन का समय है—क्या हम वास्तव में गरीबी के चक्रव्यूह से बाहर निकल रहे हैं, या आंकड़ों की बाज़ीगरी ने हमें भ्रमित कर दिया है? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
पिछले दो दशकों में भारत ने गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, इस पर अब शायद ही कोई संदेह रह गया है। विश्व बैंक द्वारा हाल ही में जारी किए गए अद्यतन मानकों के अनुसार, अत्यंत गरीबी (प्रति दिन 3 डॉलर से कम पर जीवन यापन) की दर घटकर 5.3% रह गई है, जबकि 2011-12 में यह आंकड़ा 27.1% था। इसी तरह, 4.20 डॉलर प्रतिदिन की सीमा से कम पर जीवन यापन करने वाले लोग भी अब केवल 23.9% रह गए हैं, जो पहले 57.7% थे। ये संख्याएं केवल संख्याएं नहीं हैं, बल्कि एक सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक संघर्ष की गाथा हैं, जो देश ने मिलकर लड़ी है।
फिर भी यह बात अनदेखी नहीं की जा सकती कि गरीबी केवल आंकड़ों से परिभाषित नहीं होती। इसका एक भावनात्मक, सामाजिक और भौगोलिक पहलू भी है। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी की दर आज भी शहरी इलाकों से कहीं अधिक है। भले ही मूल्य निर्धारण और खर्च के आधार पर यह अंतर कुछ कम आंका जा सकता हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत यही है कि सुविधाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों में असमानता अभी भी स्पष्ट रूप से बनी हुई है।
एक बड़ी समस्या यह है कि भारत में अभी भी एक स्वीकार्य एवं अद्यतन गरीबी रेखा की स्पष्ट परिभाषा का अभाव है। जब तक हम अपनी घरेलू परिस्थितियों और उपभोग की यथार्थ स्थिति के आधार पर सटीक गरीबी रेखा नहीं तय करेंगे, तब तक नीति निर्धारण अधूरा और दिशा भ्रमित ही रहेगा। विश्व बैंक के मानकों पर निर्भर रहना एक अस्थायी उपाय हो सकता है, लेकिन भारत जैसे विविधताओं वाले देश को अपनी स्वदेशी गरीबी रेखा पर फिर से विचार करना होगा।
यह भी एक विडंबना है कि देश में करोड़ों लोग आज भी मुफ्त राशन योजनाओं पर निर्भर हैं, जबकि आंकड़ों में गरीबी का स्तर काफी घटा हुआ दिखाया जा रहा है। यह विसंगति यह सवाल खड़ा करती है कि सरकारी योजनाएं वास्तव में किस हद तक प्रभावी हैं और वे किन वर्गों तक पहुंच रही हैं? जब तक इस पर गहन अध्ययन और पारदर्शी मूल्यांकन नहीं होगा, तब तक नीतिगत निर्णयों की वैधता संदेह के घेरे में रहेगी।
इसके साथ ही यह भी स्वीकार करना होगा कि गरीबी का अंत कठिन और जटिल यात्रा का अंतिम पड़ाव होता है। आर्थिक झटके, जैसे कोविड महामारी, बार-बार लोगों को गरीबी रेखा से नीचे खींच लाते हैं। इसीलिए नीतियों को केवल प्रगति का उत्सव नहीं बनना चाहिए, बल्कि उन्हें लचीलापन और दीर्घकालिक स्थायित्व भी प्रदान करना चाहिए।
भारत को अब एक ठोस, सटीक और भारतीय संदर्भों पर आधारित गरीबी आकलन प्रणाली की आवश्यकता है, जो केवल बहुपक्षीय मानकों पर आधारित न होकर, घरेलू साक्ष्यों, सर्वेक्षणों और सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के सम्यक विश्लेषण पर आधारित हो। तभी हम वास्तविक गरीबी के उन्मूलन की दिशा में ठोस कदम उठा सकेंगे—न केवल आंकड़ों में, बल्कि धरातल पर भी।
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