अंबेडकर की प्रतिमाएं टूट रही हैं — समाज का आत्मा भी दरक रही है!
संपादकीय
*"अंबेडकर की प्रतिमाएं टूट रही हैं — समाज का आत्मा भी दरक रही है!"*
7 जून 2025
देश के संविधान निर्माता, समाज सुधारक और दलित चेतना के प्रतीक डॉ. भीमराव अंबेडकर न केवल एक व्यक्ति हैं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक आत्मा का जीवंत प्रतीक हैं। वे उस संघर्ष की मूर्ति हैं, जिसमें समानता, समता, शिक्षा और सामाजिक न्याय की लौ जलती है। ऐसे महामानव की प्रतिमाओं के साथ बार-बार छेड़छाड़ और उन्हें खंडित करना केवल मूर्तिभंजन नहीं, बल्कि देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक सौहार्द पर सीधा हमला है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
पिछले मात्र तीन महीनों में डॉ. अंबेडकर की प्रतिमाओं के साथ ग्यारह से अधिक बार छेड़छाड़ की घटनाएं हुई हैं — उत्तर प्रदेश के प्रयागराज, मऊ, आज़मगढ़, मैनपुरी, हरदोई, सोनभद्र, सुल्तानपुर और संत कबीर नगर से लेकर पंजाब के बटाला और फिल्लौर तथा मध्य प्रदेश के धार जिले तक। इनमें से अधिकतर घटनाएं रात्रि के अंधकार में अंजाम दी गईं, जब समाज सोया रहता है और विघटनकारी तत्व सक्रिय हो जाते हैं।
1 जून को फिल्लौर में खालिस्तानी आतंकी पन्नू द्वारा बाबा साहेब की प्रतिमा पर कालिख पोतना, सिर्फ एक उन्मादी कृत्य नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और वैचारिक चुनौती है, जिसका मकसद पंजाब जैसे संवेदनशील राज्य में विघटन, जातीय तनाव और साम्प्रदायिक ज़हर घोलना है। इससे पहले उत्तर प्रदेश के गांवों में प्रतिमाओं को खंडित करना, उनके अंगों को तोड़ना या पूरी प्रतिमा उखाड़ने की कोशिश करना यह दर्शाता है कि यह सिर्फ इक्का-दुक्का घटनाएं नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश हो सकती है।
यह चिंतन का विषय है — डॉ. अंबेडकर की प्रतिमा को तोड़कर किसे क्या हासिल होता है? क्या यह दलित समुदाय को उकसाने की योजना है? क्या यह राष्ट्र को भीतर से तोड़ने की एक नई प्रयोगशाला बन रही है? डॉ. अंबेडकर का अपमान किसी एक जाति या वर्ग का अपमान नहीं, बल्कि भारतीय संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक समरसता का अपमान है।
बाबा साहेब न केवल दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले नेता थे, बल्कि उन्होंने समूचे भारत के लिए एक समान, न्यायसंगत और धर्मनिरपेक्ष संविधान का निर्माण किया। वे हिन्दू कोड बिल जैसे सुधारवादी कानूनों के पक्षधर थे, शिक्षा के प्रवर्तक थे, और भारतीय समाज को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की नींव पर खड़ा करने के लिए आजीवन संघर्ष करते रहे।
आज उनकी प्रतिमाओं को खंडित करके जिन तत्वों को लगता है कि वे उनकी विचारधारा को मिटा सकते हैं, वे यह नहीं समझते कि विचार कभी मूर्तियों के सहारे जीवित नहीं रहते, बल्कि समाज की चेतना में बसते हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि जब विचारों को दबाने के लिए बार-बार मूर्तियां तोड़ी जाती हैं, तो यह एक संकेत होता है कि समाज की चेतना पर हमला हो रहा है।
सरकार और प्रशासन को इन मामलों में ‘नजीर बनने वाले कठोरतम दंड’ देने चाहिए। न केवल इन मामलों की त्वरित जांच और गिरफ्तारी हो, बल्कि विशेष अदालतों के ज़रिए सजा दिलाई जाए ताकि ऐसे प्रयास करने से पहले लोग हजार बार सोचें। सीसीटीवी निगरानी, प्रतिमा स्थलों की सुरक्षा, और सामाजिक समरसता के लिए ग्राम स्तर पर शांति समितियों का गठन समय की आवश्यकता है।
जनता की भूमिका क्या हो?
सिर्फ प्रशासन नहीं, समाज को भी यह आत्मावलोकन करना होगा कि हमारे बीच अब भी ऐसी मानसिकता जिंदा है जो दलित प्रतीकों से डरती है। यह डर उस अंधे अहंकार से आता है, जिसे बाबा साहेब की चेतना चुनौती देती है। यह समय है उस चेतना को सशक्त करने का, उसे मूर्तियों से निकालकर शिक्षा, सेवा और सम्मान के रूप में अपनाने का।
जब डॉ. आंबेडकर की प्रतिमाएं टूटती हैं, तो यह सिर्फ मूर्तियों का नुकसान नहीं होता, यह समाज की मानवता, विवेक और समरसता के पतन का संकेत होता है। यदि हम अब भी नहीं जागे, तो यह आग घर-घर तक पहुंचेगी। बाबा साहेब ने चेताया था — "जो समाज अन्याय पर चुप रहता है, वह अपनी बर्बादी की नींव रखता है।"
अब वक्त है चुप्पी तोड़ने का, और न्याय व समता की मशाल को फिर से ऊंचा उठाने का, क्योंकि आजकल बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमाओं के साथ हो रही छेड़छाड़ कोई साधारण शरारत नहीं, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र, संविधान और सामाजिक समरसता पर सुनियोजित हमला है। ये घटनाएं जातीय वैमनस्य फैलाने, दलित चेतना को दबाने और संवैधानिक मूल्यों को कमजोर करने का प्रयास हैं। बाबा साहेब किसी एक जाति के नहीं, बल्कि समूचे भारत और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रतीक हैं।
समाज को अब मौन दर्शक की भूमिका छोड़कर इन हमलों के विरुद्ध एकजुट होना होगा। सरकार को चाहिए कि वह केवल एफआईआर दर्ज करने तक सीमित न रहे, बल्कि दोषियों पर त्वरित व कठोरतम दंड दे। मीडिया, सामाजिक संगठनों, युवाओं और बुद्धिजीवियों को भी इस चेतना की रक्षा के लिए सामने आना होगा।
यह केवल मूर्तियों की सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि हमारे संविधान, अधिकारों और लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा का प्रश्न है। अगर आज सजग नहीं हुए तो कल हमारे भीतर की लोकतांत्रिक चेतना भी खंडित हो जाएगी। अब समय है — सजग नागरिक बनने का, न कि खामोश तमाशबीन रहने का।
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