संस्कारों से सजी सफलता : सच्ची जीत वही, जब मां-बाप का सिर गर्व से ऊंचा हो
संपादकीय
2 अक्टूबर 2025
*“संस्कारों से सजी सफलता : सच्ची जीत वही, जब मां-बाप का सिर गर्व से ऊंचा हो”*
हम जिस समाज में रहते हैं, वहाँ सफलता को अक्सर केवल धन, पद और लोकप्रियता से मापा जाता है। लेकिन असली और स्थायी सफलता वही है, जिसमें चरित्र और संस्कार की झलक हो — और जिस पर सबसे पहले गर्व करें आपके माता-पिता। जहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलताहै।
माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए निस्वार्थ त्याग करते हैं। वे अपने सुख-सुविधाओं को छोड़कर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, अच्छे संस्कार और जीवन के मूल्य सिखाने में जुटे रहते हैं। उनका सपना केवल इतना होता है कि उनका बच्चा समाज में सम्मान पाए, आत्मनिर्भर बने और ईमानदारी व मेहनत से अपनी पहचान बनाए।
लेकिन आज के दौर में सफलता की होड़ में बहुत से लोग यह भूल जाते हैं कि उनकी जड़ें कहाँ हैं। पैसे और पद की चमक में वे उस व्यक्ति के त्याग को पीछे छोड़ देते हैं, जिसने उन्हें चलना सिखाया, गिरने पर उठाया। यही कारण है कि समाज में आज भले ही अमीरी बढ़ रही है, लेकिन संस्कार और संवेदनशीलता कम हो रही है।
सच्ची सफलता वह है, जब लोग आपको नहीं, बल्कि आपके माता-पिता को प्रणाम करें। यह तभी संभव है, जब आपकी उपलब्धियों में आपके चरित्र और संस्कार की महक हो। यह सफलता केवल आपको नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज को गर्व देती है।
आज जरूरत है कि हम केवल “क्या बनना है” यह न सोचें, बल्कि “कैसे बनना है” यह भी तय करें। हम चाहे डॉक्टर बनें, इंजीनियर, वकील, नेता या पत्रकार — हमारे काम में ईमानदारी, मेहनत, सहानुभूति और समाज के प्रति जिम्मेदारी झलके। तभी हमारी पहचान दूसरों से अलग और ऊँची बनेगी।
याद रखिए —“ऐसा जीवन जियो कि तुम्हारी सफलता से पहले तुम्हारे संस्कार बोले और लोग तुम्हें देखकर तुम्हारे माता-पिता को सलाम करें।”
सिर्फ यही नहीं, यह दृष्टिकोण युवाओं को यह भी सिखाता है कि आत्मविश्वास और मेहनत के साथ-साथ विनम्रता, संयम और आभार जैसे गुण भी उतने ही जरूरी हैं। यही गुण आपकी सफलता को स्थायी और सार्थक बनाते हैं।
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