"सोने-चांदी का बोझ या रिश्तों की चमक?"
✍️ *संपादकीय*
10 अक्टूबर 2025
*"सोने-चांदी का बोझ या रिश्तों की चमक?"*
त्योहारों और शादी-ब्याह का मौसम आने पर जहाँ घर-आँगन खुशियों से गूंजने चाहिए, वहीं आजकल हर दूसरे घर में चिंता का विषय गहनों का वजन और सोने-चांदी का भाव बन गया है। बाजार में चमकते गहनों से ज्यादा लोगों की आँखों में महँगाई की आग झलक रही है। दीपावली के बाद शुरू होने वाले विवाह सीजन में अभिभावकों के माथे पर सबसे बड़ी शिकन यही है कि दूल्हा-दुल्हन के लिए कितने तोले सोना खरीदना पड़ेगा। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
भारतीय समाज में स्त्रीधन और गहनों की परंपरा पुरानी है, लेकिन यह परंपरा अब ‘शो-ऑफ’ और ‘तुलना’ का रूप ले चुकी है। दुल्हन की चमक उसके व्यक्तित्व, शिक्षा और संस्कारों से नहीं, बल्कि गले में झूलते हार और हाथों में खनकते कंगनों से आँकी जाने लगी है। हालात ऐसे हैं कि शादी का आधा बजट खान-पान, सजावट और अन्य खर्चों पर लगता है, तो आधे से ज्यादा गहनों पर। यही कारण है कि शादी खुशी का पर्व कम और चिंता का भंडारा ज्यादा बनता जा रहा है।
"सबसे बड़ा रोग – क्या कहेंगे लोग"
यह कहावत आज के विवाह आयोजनों पर सटीक बैठती है। दिखावे और सामाजिक रस्मोरिवाजों की आड़ में अभिभावक अपने खून-पसीने की कमाई गहनों की दुकानों पर उंडेल देते हैं। स्थिति यहाँ तक आ जाती है कि जिन परिवारों की हाल ही में शादियाँ हो चुकी हैं, उन्हें अगली शादी में भी "उतना ही सोना" दिखाना मजबूरी बन जाता है। वरना समाज के 'भाई लोग' तुरंत तुलना कर देंगे और रिश्तेदार फुसफुसाहट से लेकर मुँह फट टिप्पणियाँ करने से नहीं चूकेंगे।
सोशल मीडिया ने भी इस बोझ को और बढ़ा दिया है। इंस्टाग्राम और फेसबुक पर चकाचौंध करते दुल्हन के फोटो और आभूषणों की नुमाइश ने आम परिवारों की चिंता दोगुनी कर दी है। हर घर के अभिभावक सोच में डूबे हैं कि बिना दस-पंद्रह तोले सोना दिए बेटी की शादी "अधूरी" न रह जाए।
पर सवाल यह है कि क्या रिश्तों की मजबूती और वैवाहिक जीवन की खुशी गहनों की चमक पर टिकी है? क्या संस्कार, शिक्षा और आपसी प्रेम से बड़ी कोई "ज्वेलरी" हो सकती है? यह सही है कि गहने स्त्रीधन हैं और उनका महत्व है, लेकिन दिखावे और प्रतिस्पर्धा ने इसे "बोझ" बना दिया है।
आज जरूरत है कि समाज इस मानसिकता से ऊपर उठे। शादी में गहनों का प्रदर्शन नहीं, रिश्तों की गर्माहट और मानवीय मूल्यों का प्रदर्शन होना चाहिए। अगर हम "क्या कहेंगे लोग" की बजाय "क्या सही है" सोचना शुरू कर दें, तो अभिभावकों की आधी चिंताएँ खत्म हो जाएँ।
सोना-चांदी के बढ़ते दाम समाज की आँखों की नींद चुरा रहे हैं, लेकिन हमें यह समझना होगा कि बेटी-दामाद की खुशियों का मोल गहनों के तोलों से नहीं, जीवन के विश्वास और अपनत्व से आँका जाना चाहिए। शादी का असली गहना संस्कार और सम्मान है, बाकी सब महज़ दिखावा है।
अब वक्त है कि शादी की परंपरा का बोझ हल्का कर रिश्तों की चमक बढ़ाई जाए।
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