गायब होती संवेदनाएं – और मरहम बनने की ज़रूरत

संपादकीय 
5 अक्टूबर 2025
*“गायब होती संवेदनाएं – और मरहम बनने की ज़रूरत”* 
तेज़ रफ़्तार और तकनीक की चकाचौंध के बीच हमारी सबसे बड़ी पूँजी – मानवीय संवेदना – चुपचाप कम होती जा रही है।
आज लोग दूसरों के दर्द को सिर्फ़ ख़बर मानते हैं, अनुभव नहीं। किसी हादसे के वीडियो पर “लाइक” तो करते हैं, मगर किसी घायल को पानी देने की हिमाकत नहीं करते। यह वही समाज है, जिसकी जड़ें करुणा और सहानुभूति में थीं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

मानवता का सबसे बड़ा गुण है – दूसरों के दर्द को अपना दर्द समझना। यह सिर्फ़ भावना नहीं, बल्कि वह ताक़त है, जो हमें स्वार्थ की सीमाओं से बाहर निकालकर सच्चा इंसान बनाती है। जिस समाज में लोग दूसरों के घाव पर मरहम लगाना सीखते हैं, वहां भाईचारा, शांति और न्याय अपने आप बढ़ते हैं।

समाज की सच्ची ताक़त सिर्फ़ ऊंची इमारतों, आधुनिक तकनीक या तेज़ रफ़्तार वाली ज़िंदगी में नहीं छुपी होती; उसकी असली ताक़त इस बात में होती है कि वहां रहने वाले लोग एक-दूसरे के दुःख-दर्द को कितना महसूस करते हैं।
दूसरों के दर्द को अपना दर्द समझना कोई सामान्य गुण नहीं – यह वह अमूल्य रत्न है, जिससे मानवता की पहचान होती है।

आज के समय में, जहां भाग-दौड़ और स्वार्थ ने इंसान को खुद के घेरे में कैद कर दिया है, यह संवेदनशीलता और भी दुर्लभ होती जा रही है। लेकिन इतिहास गवाह है कि हर बड़ा बदलाव तब हुआ है, जब लोगों ने दूसरों के दर्द को अपना माना। यही भावना हमें न केवल एक-दूसरे से जोड़ती है, बल्कि हमें स्वार्थ और अहंकार की सीमाओं से ऊपर उठाकर एक बेहतर इंसान और एक संवेदनशील समाज बनाती है।

जीवन के संघर्षों से गुज़रा व्यक्ति ही दूसरों के दर्द को सबसे गहराई से समझ सकता है। उसकी आंखों में हमदर्दी होती है और उसकी संवेदनशीलता बिना शब्दों के भी अपनापन बांटती है। यही कारण है कि सच्चा समाज-निर्माता वही है, जो करुणा को अपना धर्म और सहानुभूति को अपना कर्म बनाता है।

करुणा कोई कमजोरी नहीं, बल्कि यह वह ताक़त है, जो इंसान को न्यायपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता देती है। जब समाज के लोग एक-दूसरे के दुःख में सहभागी बनते हैं, तो वहां सामंजस्य, भाईचारा और शांति स्वतः बढ़ती है। ऐसी भावना न केवल व्यक्तिगत संबंधों को मज़बूत करती है, बल्कि एक न्यायपूर्ण और मानवीय व्यवस्था को भी जन्म देती है।

इसलिए, ज़रूरत है कि हम सब इस विचार को अपने जीवन में उतारें – सिर्फ़ उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि अभ्यास के रूप में। जब हम दूसरों के दर्द को महसूस करना सीखते हैं, तो दुनिया निश्चित ही एक बेहतर जगह बनती है।

आज समय है कि हम अपने बच्चों को भी यह सिखाएं कि सफल वही नहीं, जो केवल अपने लिए कमाए, बल्कि सफल वह है, जिसके व्यवहार से दूसरों को सहारा मिले, जिसकी करुणा से समाज में नया उजाला फैले।

जीवन के संघर्षों से गुज़रा व्यक्ति दूसरों की पीड़ा को गहराई से महसूस करता है। उसकी नज़रें बिना शब्दों के भी अपनापन बाँटती हैं। यही अपनापन ही संवेदनाओं को फिर से जगा सकता है।
हम सबको चाहिए कि सिर्फ़ दर्शक न बनें, बल्कि मरहम बनें। अपने आसपास की तकलीफ़ को महसूस करें, उसे हल्का करने की कोशिश करें। और अंत में यही कहूंगा कि-
 “मानवता बचानी है तो संवेदनाएँ जगानी होंगी; सिर्फ़ देखना नहीं, दूसरों के दर्द में शामिल होकर मरहम बनना होगा।”

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