कानून किताबों में कैद, इंसाफ हवेली में बंद

संपादकीय 
17 नवंबर 2025
*“कानून किताबों में कैद, इंसाफ हवेली में बंद”* 
गाँव के चौपाल पर बैठा एक बुज़ुर्ग अक़्सर कहता था – “बेटा, कानून की किताब मोटी होती है लेकिन उसके पन्ने गरीब के घर तक नहीं पहुँचते।” यही सच्चाई है। भारत में संविधान लिख दिया गया, उसमें समानता, न्याय और स्वतंत्रता के गीत गा दिए गए, मगर जब बात ज़मीनी हक़ीक़त की आती है, तो कानून एक थके हुए मुंशी की तरह फाइलों में सोता रहता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

सवाल यह है कि कानून सिर्फ़ किताबों में लिखा हुआ हक़ है या सचमुच गरीब की झोपड़ी में जलता हुआ दीया भी है? कानून: गरीब के लिए तिजोरी का ताला है। लेकिन इस ताले की चाबी गरीब के पास नहीं है। कहते हैं भारत का संविधान हर नागरिक को समान अधिकार देता है। मगर व्यवहार में कानून अमीर के लिए हेलमेट है और गरीब के लिए हथकड़ी। अदालतें समय पर अमीर को ज़मानत देती हैं, लेकिन गरीब के केस में तारीख़ पर तारीख़ का सिलसिला चलता रहता है। यही वजह है कि उपेक्षित समाज हमेशा न्याय की चौखट पर धक्के खाता है।

हमारे देश में शिक्षा को “अधिकार” कहा जाता है, लेकिन हक़ीक़त में यह उस दुकान का सामान है, जहाँ गरीब के पास खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। उच्च जातियों और सम्पन्न वर्गों के बच्चे बड़े-बड़े स्कूलों में अंग्रेज़ी की चाशनी में डूबकर पढ़ते हैं, और दलित-पिछड़े समाज का बच्चा टूटी बेंच पर बैठकर ‘अ से अनार’ ही रटता रह जाता है। यही शिक्षा की खाई समाज को अलग-अलग वर्गों में बाँटकर शोषण को और गहरा करती है।

अंग्रेजों का फूट डालो राज करो नीति का नया संस्करण बांटो और राज करो पुनः आ गया है। भारत से भले ही अंग्रेज  चले गए, मगर उनकी “Divide and Rule” की नीति आज भी जिंदा है। फर्क इतना है कि अब अंग्रेज़ों की जगह हमारे ही समाज के ठेकेदारों ने ले ली है। उपेक्षित समाज के लोग जाति, उपजाति और छोटे-छोटे स्वार्थों में बंटे हुए हैं। यही बिखराव उन्हें शोषण के खिलाफ़ एकजुट नहीं होने देता। सोचिए, जिस समाज में “एकता” नहीं है, वहाँ “क्रांति” का सपना सिर्फ़ भाषणों और नारेबाज़ी तक सीमित रह जाता है।

जागरूकता: जब तक नींद है, तब तक गुलामी है। क्या आप जानते हैं उपेक्षित समाज के कई लोग अपने अधिकारों के बारे में जानते ही नहीं। जो जानते हैं, वे डर के मारे आवाज़ नहीं उठाते। परिणाम यह कि सत्ता और समाज के ठेकेदार उनकी अज्ञानता को ढाल बनाकर शोषण करते रहते हैं।
एक जागरूक इंसान गुलाम नहीं बन सकता, लेकिन सोता हुआ समाज हमेशा जंजीरों में जकड़ा रहेगा।

सरकार और समाज की भूमिका मूल्यांकन करें तो सरकारें हर पाँच साल में “समानता और न्याय” का जुमला बेचकर वोट बटोर लेती हैं। लेकिन चुनाव ख़त्म होते ही वही जनता को भूल जाती हैं। समाज सुधार की बातें मंच से होती हैं, मगर ज़मीनी स्तर पर दलित-बस्तियों में जाकर कोई काम नहीं करता।
असल में यह हमारी सामूहिक विफलता है – सरकार भी दोषी है और हम नागरिक भी।

1. कानून का कठोर क्रियान्वयन – किताबों से निकालकर ज़मीनी हकीकत में लागू करना होगा।
2. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा – हर बच्चे तक बराबर पहुँचानी होगी।
3. सामाजिक एकता – जाति और उपजाति की दीवारों को तोड़कर ही शोषण के खिलाफ लड़ाई जीती जा सकती है।
4. जागरूकता अभियान – हर घर तक संविधान का संदेश पहुँचाना होगा।
आज भारत “विश्वगुरु” बनने का सपना देख रहा है, लेकिन अपने ही नागरिकों को न्याय और समानता न दिला पाने का कलंक भी झेल रहा है।
अगर समाज के सबसे कमजोर वर्ग के साथ अन्याय बंद नहीं हुआ, तो लोकतंत्र सिर्फ़ नाम का लोकतंत्र रह जाएगा – असल में वह “ठेकेदारों का तंत्र” बनकर रह जाएगा।

और अंत में — “कानून तभी कानून है, जब वह झोपड़ी और महल दोनों पर बराबर लागू हो। वरना वह तो सिर्फ़ सत्ता के हाथों का खिलौना है।”

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