जूता फेंकने वाले हाथों पर नहीं, मानसिकता पर मुकदमा जरूरी है!

संपादकीय 
8 अक्टूबर 2025

 *“जूता फेंकने वाले हाथों पर नहीं, मानसिकता पर मुकदमा जरूरी है!”* 

भारतीय लोकतंत्र के सबसे ऊँचे न्याय मंदिर — सर्वोच्च न्यायालय — में जब एक अधिवक्ता ने मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की ओर जूता उठाया, तब यह महज़ एक “उत्तेजित व्यक्ति का पागलपन” नहीं था; यह उस कुंठित मानसिकता का नग्न प्रदर्शन था जो आज भी जाति, धर्म और अहंकार के बोझ से मुक्त नहीं हो सकी है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

सच यह है कि न्यायालय कभी किसी व्यक्ति का दुश्मन नहीं होता। वह सार्वजनिक विश्वास की आखरी गारंटी है। इसीलिए न्यायाधीशों पर शाब्दिक या शारीरिक हमले, चाहे वे कितने गंभीर हों, लोकतंत्र के स्तंभों पर वार समान हैं। हमें आज यह पूछना चाहिए — क्या हम अदालतों की गरिमा इतनी सस्ती मान चुके हैं?

यह मामला सिर्फ “एक वकील का पागलपन” नहीं है। वह उस बिंदु की चेतावनी है, जहां न्याय की आवाज़ दबाने की प्रवृत्ति हिंसक रूप ले लेती है। वकील का नाम राकेश किशोर बताया गया है, और उसने कहा कि उसका हक है कि वह “सनातन धर्म का अपमान नहीं सह सके।” 

लेकिन किसी भी धर्म की आड़ लेकर न्यायपालिका पर हमला करना संविधान और न्याय प्रक्रिया के लिए खतरा है। यदि धार्मिक कट्टरता को न्यायसंगत आरोपों की जगह लेनी लगे, तो न्याय का मतलब खो जाएगा।

यह हमला न्यायाधीश पर नहीं, बल्कि न्याय की गरिमा पर था। संविधान पर था। और सबसे बढ़कर, उस भारत की आत्मा पर था जिसने दलित पृष्ठभूमि से आने वाले एक व्यक्ति को न्याय की सर्वोच्च कुर्सी तक पहुँचाया।

आज जो लोग “सनातन धर्म की रक्षा” के नाम पर जूता फेंकने का साहस कर रहे हैं, वे यह भूल जाते हैं कि सनातन का अर्थ कभी हिंसा, अपमान या असहिष्णुता नहीं रहा। बल्कि सनातन का अर्थ रहा है — सत्य, धैर्य और न्याय का सनातन मूल्य। लेकिन जब धर्म की आड़ में नफ़रत को प्रतिष्ठा दी जाती है, तब धर्म नहीं, धर्म का व्यापार जन्म लेता है।

मुख्य न्यायाधीश गवई ने जिस शांति और संयम के साथ इस घटना को निपटाया, वह न सिर्फ़ उनके व्यक्तित्व का परिचायक है बल्कि न्यायपालिका की संवैधानिक दृढ़ता का प्रतीक भी है। उन्होंने कहा — “I am not distracted; continue with the hearing.” यह वाक्य इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों से दर्ज होगा।

परंतु सवाल यह है — जब जूता फेंकने वाला व्यक्ति एक अधिवक्ता है, जो कानून का ज्ञाता कहलाता है, तो यह घटना केवल एक अपराध नहीं बल्कि न्यायिक पेशे की नैतिक आत्मा पर कलंक है।

और अधिक गंभीर यह कि अदालत में यह सब होते हुए भी रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई, कठोर कार्रवाई में विलंब हुआ — क्या यह न्यायालय की निष्पक्षता की परीक्षा नहीं है? क्या यह इसलिए कि इस बार वह निशाना एक दलित पृष्ठभूमि से आने वाले न्यायाधीश पर था?

इसी प्रश्न से पूरा समाज असहज है। जब जातिगत अहंकार और धार्मिक उन्माद अदालत की चौखट तक पहुँच जाए, तो यह समझना कठिन नहीं कि लोकतंत्र की आत्मा किस संकट से गुज़र रही है।

बी. आर. गवई को “दलित न्यायाधीश” कहकर पहचानना ही उनके योगदान का अपमान है। वे केवल दलित नहीं — विद्वान, निडर और तर्कशील न्यायमूर्ति हैं, जिन्होंने अपने निर्णयों से स्पष्ट कर दिया है कि न्याय की कुर्सी पर व्यक्ति नहीं, संविधान बैठता है।

गवई ने अपने एक पुराने भाषण में कहा था — “हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं, लेकिन धर्म की आड़ में निजी स्वार्थ को बढ़ावा देने वालों से दूरी बनानी चाहिए।”
आज वही बात सटीक बैठती है। जूता फेंकने वाला व्यक्ति सिर्फ़ एक “अभियुक्त” नहीं है — वह उस सोच का प्रतिनिधि है जो न्याय से ऊपर धर्म को, और धर्म से ऊपर अपना स्वार्थ रखती है।

भारत में ऐसी घटनाएँ पहले भी हुई हैं — न्यायाधीशों को धमकियाँ मिलीं, कोर्ट के आदेशों पर भीड़ें भड़काई गईं। लेकिन पहली बार यह हुआ है कि देश के मुख्य न्यायाधीश पर ही न्याय की कुर्सी के सामने हमला करने की हिम्मत दिखाई गई।
यह बताता है कि समाज का एक हिस्सा अब न्याय के बजाय न्यायाधीश की जाति देख रहा है।

और यही सबसे बड़ा ख़तरा है।
क्योंकि जब न्याय का चेहरा जाति या धर्म से देखा जाने लगे, तब संविधान की आँखों पर पट्टी नहीं, पक्षपात का पर्दा पड़ जाता है।

सोशल मीडिया पर इस घटना के बाद जो टिप्पणियाँ आईं, वे और भी चिंताजनक हैं। कोई कहता है “सनातन की जीत हुई”, कोई “दलित अहंकार टूटा।” यह भारत की आत्मा पर ऐसा ज़ख्म है जो सभ्यता को शर्मसार करता है।

क्या यही है वह भारत, जहाँ बाबा साहेब ने कहा था — “I measure the progress of a community by the degree of progress which women and the lowest castes have achieved”?
यदि हाँ, तो यह घटना हमें बहुत पीछे ले गई है।

अब वक्त है कि न्यायपालिका और जनता दोनों यह संदेश दें —
“जूता फेंकना साहस नहीं, मूर्खता है; धर्म की रक्षा हिंसा से नहीं, विवेक से होती है।”

यदि अदालतें इस पर सख़्त एक्शन नहीं लेंगी, तो यह उदाहरण अन्य लोगों को उकसाने का काम करेगा। और यदि अदालतें खामोश रहीं, तो न्यायपालिका की प्रतिष्ठा धीरे-धीरे कटघरे में खड़ी कर दी जाएगी।

यहां यह स्पष्ट मत है कि — मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई न सिर्फ़ न्याय के प्रहरी हैं, बल्कि उस सामाजिक परिवर्तन के प्रतीक हैं जो सदियों की ऊँच-नीच के बाद आकार ले रहा है।
इसलिए उनके प्रति अपमान का अर्थ है — भारत के संविधान, समानता और विवेक की आत्मा का अपमान।

हम यह नहीं चाहते कि कोई व्यक्ति कठोर सज़ा पाए —
हम चाहते हैं कि मानसिकता सज़ा पाए।
वह मानसिकता जो न्याय से पहले जाति देखती है, विवेक से पहले धर्म का झंडा उठाती है।

इस देश को फिर से एक भीम चाहिए —जो कलम से लड़ सके, जूते से नहीं।

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