शिक्षा विभाग का तुगलकी फरमान – पढ़ने-लिखने पर पाबंदी आखिर क्यों?

संपादकीय 
14 अक्टूबर 2025
 *“शिक्षा विभाग का तुगलकी फरमान – पढ़ने-लिखने पर पाबंदी आखिर क्यों?”* 
राजस्थान सरकार के शिक्षा विभाग की ओर से हाल ही में जारी किया गया आदेश वाकई शिक्षा व्यवस्था पर एक गहरी चोट है। आदेश के अनुसार दीपावली की छुट्टियों में यदि कोई प्राइवेट स्कूल संचालक बच्चों को पढ़ाता है या संस्थान खोला जाता है, तो उस पर सख़्त कार्रवाई होगी, यहां तक कि मान्यता रद्द करने की धमकी दी गई है। इसे देखकर सहज ही सवाल उठता है—क्या हमारे शिक्षा विभाग का असली काम बच्चों को पढ़ने-लिखने से रोकना है? क्या यही भारतीय संस्कृति और आधुनिक शिक्षा की ज़िम्मेदारी है? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

त्योहारों का अपना सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व है, यह निर्विवाद सत्य है। दीपावली जैसे पर्व बच्चों और शिक्षकों को सामूहिक उल्लास का अवसर देते हैं। लेकिन यदि कोई संस्थान इन छुट्टियों के दौरान बच्चों को अतिरिक्त शिक्षा देने की पहल करता है, तो इसमें आपत्ति की गुंजाइश कहां है? यह तो बच्चों और अभिभावकों की स्वैच्छिक सहमति पर आधारित पहल है। जब प्रतियोगिता का युग है, हर माता-पिता अपने बच्चों को आगे बढ़ते देखना चाहता है, तो उन्हें ज्ञान प्राप्ति के अवसर से वंचित करना न केवल हास्यास्पद है बल्कि शिक्षा विभाग की अदूरदर्शिता का प्रमाण भी है।

यह आदेश सीधे-सीधे बताता है कि राजस्थान शिक्षा विभाग का मकसद पढ़ाई करवाना नहीं, पढ़ाई रोकना है। अधिकारी शायद इस सिद्धांत पर जीते हैं—“हम खुद मेहनत नहीं करेंगे, तो दूसरों को क्यों करने देंगे।” उन्हें यह भय है कि कहीं प्राइवेट स्कूल छुट्टियों में भी बच्चों को पढ़ाकर उनके सरकारी नतीजों की पोल न खोल दें। क्योंकि सरकारी स्कूलों में तो नीति है—“बच्चे पास होंगे चाहे उन्हें अक्षर भी न आते हों।” यह नीति इतनी महान है कि अब बच्चा फेल होना ही भूल गया है।

सोचने की बात है—त्योहारों का मतलब केवल पटाखे फोड़ना, मिठाई बांटना और सजावट करना है या फिर नए संकल्पों और आत्मबल के साथ आगे बढ़ना भी है? दीपावली अंधकार मिटाने का पर्व है। लेकिन राजस्थान शिक्षा विभाग का आदेश तो कहता है—“अज्ञानता का अंधकार रहने दो, कहीं ज्ञान की एक चिंगारी भी न फूटने पाए।”

यह तो वही बात हुई जैसे कोई किसान बीज बोने जाए और सरकार कहे—“अभी त्योहार है, खेत मत जोतो, फसल मत बोओ।” या कोई डॉक्टर मरीज को दवा देने लगे और विभाग फरमान सुनाए—“त्योहारों में इलाज मत करो, नहीं तो रजिस्ट्रेशन रद्द कर देंगे।” हास्यास्पद ही नहीं, बल्कि शर्मनाक भी है।

असल में समस्या यह है कि जिन अधिकारियों ने यह आदेश तैयार किया है, उनके बच्चे या तो एयरकंडीशंड प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं या विदेशों में पढ़ाई कर रहे हैं। उन्हें पता है कि उनके वंशजों के भविष्य को कोई खतरा नहीं है। खतरा तो उस किसान, मजदूर, रिक्शा चालक और छोटे दुकानदार के बच्चे के लिए है, जो सरकारी स्कूल की बर्बादी से बचने के लिए प्राइवेट स्कूल का रुख करता है। शिक्षा विभाग चाहता है कि गरीब का बच्चा कभी भी प्रतिस्पर्धा की दौड़ में उच्च वर्ग के बच्चों के बराबर न आ सके।

यह आदेश दरअसल व्यवस्था की ‘भ्रष्ट मानसिकता’ का आईना है। अधिकारी चाहते हैं कि “गरीब का बच्चा बस अक्षरज्ञान तक सीमित रहे, ताकि वह जीवनभर मजदूरी ही करता रहे।” क्योंकि यदि यह बच्चा पढ़-लिखकर आगे बढ़ गया तो वह प्रश्न पूछेगा, तर्क करेगा, और यह व्यवस्था तर्कशील जनता से सबसे अधिक डरती है। इसलिए त्योहारों के बहाने शिक्षा पर ताले लगाने का यह खेल खेला गया है।

व्यंग्य यही है कि शिक्षा विभाग को बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा चिंता इस बात की है कि दीपावली की छुट्टियों में कहीं स्कूल की दीवारें साफ न हो जाएं, कहीं कक्षाओं में दीप न जग जाए। यह वही विभाग है, जो सालों से अपने ही स्कूलों की मरम्मत नहीं करा पाया। जिनके भवन टपकते हैं, वहां बैठकर बच्चे क्या पढ़ेंगे, यह प्रश्न कभी अधिकारियों को परेशान नहीं करता। लेकिन छुट्टी के दिन यदि कोई शिक्षक पढ़ा दे, तो यह उनकी संस्कृति पर हमला हो जाता है।

सवाल यह भी है—क्या शिक्षा पर पाबंदी ही भारतीय संस्कृति की रक्षा है? क्या दीपावली का उत्सव केवल “काम बंद करने और अज्ञान को ढकने” का पर्व है? नहीं! दीपावली तो अंधकार मिटाने का संदेश देती है। लेकिन राजस्थान शिक्षा विभाग के इस तुगलकी आदेश ने दीपावली को अज्ञान की चादर ओढ़ाने का पर्व बना दिया है।

इस पूरे प्रकरण को देखकर यही लगता है कि शिक्षा विभाग अब “न पढ़ेंगे, न पढ़ने देंगे” के नारे पर काम कर रहा है। यह आदेश केवल एक प्रशासनिक निर्देश नहीं, बल्कि इस व्यवस्था के पतन का प्रतीक है। बच्चों की मेधा, माता-पिता की आकांक्षा और शिक्षकों की मेहनत का मज़ाक उड़ाने वाला यह फरमान, वास्तव में भविष्य की हत्या है।

अंततः कहना यही होगा कि यदि दीपावली की छुट्टियों में किसी विद्यालय ने बच्चों को पढ़ाया तो इससे देश की कौन सी राष्ट्रीय संपत्ति लुट जाएगी? कौन सा धर्म खतरे में पड़ जाएगा? कौन सी संस्कृति कलंकित हो जाएगी? सच्चाई यह है कि इस आदेश से केवल एक ही चीज़ कलंकित हुई है—शिक्षा विभाग की सोच और नीतियां।

आज जरुरत है कि समाज खुलकर इस आदेश का विरोध करे और कहे—

“दीपावली के दीयों से डरने वाले अंधेरे के सौदागर, शिक्षा के उजाले को रोक नहीं सकते। गरीब का बच्चा पढ़ेगा, आगे बढ़ेगा और यही इस व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा जवाब होगा।”

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