दीपावली के बहाने — संस्कृति की ओर लौटें
*दीपावली के बहाने — संस्कृति की ओर लौटें*
20 October 2025
“दीपावली केवल दीपों का उत्सव नहीं, बल्कि यह अंधकार से प्रकाश, निराशा से आशा और अहंकार से त्याग की यात्रा का संदेश है। हर वर्ष जब घर-आंगन दीपमालाओं से जगमगाते हैं, तो मन में एक प्रश्न भी कौंधता है—क्या यह प्रकाश केवल बाहर तक सीमित रहेगा या हमारे भीतर के अंधकार को भी मिटाएगा?
यह पर्व हमें याद दिलाता है कि दीप जलाने का अर्थ केवल मिट्टी के दीये में तेल भरना नहीं, बल्कि हृदय में करुणा, समाज में बंधुत्व और जीवन में सत्य का प्रकाश फैलाना है। दीपावली तभी सार्थक है, जब दीप हमारे भीतर भी जल उठें और हर कोना रोशनी से भर जाए।” यह मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
हमारा संस्कृति से कटाव और बीमारी का फैलाव शुरू हुआ है। जैसे-जैसे घर से योग गायब हुआ, वैसे-वैसे रोगों ने दस्तक दी। ठीक उसी प्रकार जब घरेलू पकवान और शुद्ध भोजन हमारी थाली से गायब हुआ, तब बीमारियों और अस्वस्थ जीवनशैली ने जकड़ लिया। बाजार की चमकदार मिठाईयाँ और नकली उत्पाद केवल शरीर को बीमार नहीं कर रहे, बल्कि हमारी संस्कृति और आत्मा को भी खोखला कर रहे हैं।
दीपावली भारतीय संस्कृति का वह पर्व है, जो केवल दीप प्रज्वलन और मिठाई बांटने का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, सामूहिकता और नए संकल्पों का पर्व रहा है। यह वह अवसर है जब घर-घर दीपक जलते थे, आँगन में रांगोली सजती थी, बच्चे उल्लास में झूमते थे, और महिलाएँ पूरे विश्वास, श्रद्धा और अपनत्व के साथ घर-परिवार के लिए पकवान तैयार करती थीं। परंतु आज यह पर्व, अपनी वास्तविकता से कटकर, धीरे-धीरे बाजारवाद और दिखावे की चकाचौंध में कैद होता जा रहा है।
बदलता स्वरूप और बाज़ार की चकाचौंध में आज दीपावली उत्सव का स्वरूप एक इवेंट मैनेजमेंट जैसा हो गया है। घर-परिवार की सादगी और आत्मीयता की जगह अब महंगे गिफ्ट पैक, नकली चमक-दमक और मिलावटी मिठाइयाँ ले चुकी हैं। मिठाई के डिब्बे अब केवल औपचारिकता का प्रतीक बनकर रह गए हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम अपने ही परिजनों, मित्रों और परिचितों को मिठाई के नाम पर केमिकल और मिलावट परोस रहे हैं। यह सिर्फ स्वाद या स्वास्थ्य की हानि नहीं है, बल्कि अपने ही समाज और रिश्तों के प्रति धोखा है।
याद कीजिए, जब घर की रसोई में गुलगुले, खीर, हलवा, दाल-बाटी-चूरमा और न जाने कितने देसी व्यंजन पूरे परिवार को एकजुट करते थे। बच्चे आँगन में पटाखे चलाते, महिलाएँ मिलकर मिठाइयाँ बनातीं और पुरुष घर की साफ-सफाई व सजावट में जुटते। वह दीपावली घर के हर कोने में उल्लास और अपनत्व भर देती थी। आज यही परंपरा खोती जा रही है। घर की रसोई से गायब हुई ये मिठाइयाँ और पकवान केवल भोजन नहीं थे, बल्कि एक संस्कृति और स्वास्थ्य का प्रतीक थे।
पशुधन और दूध संस्कृति का पतन हो चुका है। आज बाजार में दूध से बनी मिठाइयाँ धड़ल्ले से बिक रही हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि खरा दूध मिलना मुश्किल है। हर गली और मोहल्ले में कभी दुधारू पशु हुआ करते थे। हर घर आत्मनिर्भर था। पर आज मशीनों और प्लास्टिक की थैलियों में बिकने वाले रासायनिक दूध ने हमारी परंपरा छीन ली है। पशुपालन, जो कभी ग्रामीण जीवन की आत्मा था, अब बोझ समझा जाने लगा है। यह बदलाव केवल खान-पान में नहीं, बल्कि हमारी जीवन दृष्टि और मूल्यों में भी आया है।
यह आत्मचिंतन का सही समय है।
आज समय है कि दीपावली के इस अवसर पर हम आत्मचिंतन करें — क्या यह पर्व केवल आतिशबाज़ी और गिफ्ट पैक तक सीमित रह जाएगा, या फिर यह नई शुरुआत, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अवसर बनेगा? हमें ठानना होगा कि इस बार दीपावली पर बाजार से खरीदी हुई नकली चमक-दमक से परे, अपने घर की रसोई, अपने श्रम और अपनी परंपराओं को महत्व देंगे।
इस दीपावली पर संकल्प लें कि हम घर की बनी मिठाइयों और पकवानों को पुनः जीवित करेंगे। परिवार के बच्चे और महिलाएँ मिलकर रसोई में काम करें, तो न केवल स्वाद और स्वास्थ्य लौटेगा, बल्कि घर में वह आत्मीयता और अपनत्व भी लौटेगा जो आज गायब हो चुका है।
सच यह है कि दीपावली का दीप केवल मिट्टी के दीयों में ही नहीं, बल्कि हमारे भीतर की संस्कृति, सादगी और आत्मनिर्भरता में भी जलना चाहिए। तभी यह पर्व केवल रोशनी का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन की सच्ची दिशा दिखाने वाला उत्सव बनेगा।
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