घर की रोशनी — जहाँ दिल को सुकून मिलना चाहिए, टूटन नही
संपादकीय
26 अक्टूबर 2025
*घर की रोशनी — जहाँ दिल को सुकून मिलना चाहिए, टूटन नही*
एक बार एक व्यक्ति ने अपने जीवन की थकान से तंग आकर पहाड़ों की ओर रुख किया। शहर की भीड़, काम का तनाव और अपनों की अपेक्षाओं ने उसे अंदर तक थका दिया था। जब कोई साधु उससे मिला और पूछा, “बेटा, भाग क्यों रहा है?” तो वह बोला — “बाहर की दुनिया ने मुझे थका दिया है।” साधु मुस्कुराया और बोला, “बाहर की दुनिया तो सबको थकाती है, लेकिन जो घर में सुकून न पा सके, वह कहीं भी चैन नहीं पा सकता।” यह बात सुनकर वह व्यक्ति मौन रह गया — क्योंकि उसे एहसास हुआ कि वह भाग रहा था, लेकिन असल में उससे ज्यादा दर्द उसे अपने ही घर के भीतर मिला था। यहां बोलेगा तो फिर कहोगे कि बोलता है
आज यही कहानी हमारे समाज की सच्चाई बन गई है। घर, जो कभी अपनापन और सुकून की सबसे सुरक्षित जगह माना जाता था, आज कई लोगों के लिए मानसिक बोझ बन गया है। बाहर की दुनिया में इंसान लड़ता है, लेकिन भीतर की दुनिया में वह टूटता है। बाहर की लड़ाइयाँ दिखती हैं, लेकिन घर की खामोशियाँ बहुत कुछ कह जाती हैं। जब घर के भीतर संवाद की जगह शिकायतें और आलोचनाएँ आने लगती हैं, जब सम्मान की जगह ताने और तुलना आने लगती है, तब दीवारें महल बन जाती हैं लेकिन घर नहीं रह पातीं।
हर इंसान बाहर की दुनिया में एक योद्धा है। वह अपने अस्तित्व, करियर और सम्मान की रक्षा में जुटा है। परंतु जब वही योद्धा घर लौटता है, तो उसे अपने कवच को उतारकर सुकून की उम्मीद होती है। दुर्भाग्य से वही घर, जहाँ उसे सबसे अधिक स्नेह और समझ मिलनी चाहिए, कई बार उसे सबसे गहरे घाव दे देता है। क्योंकि वहाँ प्यार की जगह अपेक्षाएँ, और समझ की जगह अहंकार ने ले ली है।
घर की सबसे बड़ी खूबसूरती होती है – “संवाद”। लेकिन आज संवाद की कमी सबसे बड़ी दूरी बन गई है। बच्चे अपने माता-पिता से बात करने की बजाय फोन में व्यस्त हैं। पति-पत्नी साथ रहते हुए भी अलग-अलग दुनियाओं में जी रहे हैं। बुजुर्ग, जो कभी घर की आत्मा होते थे, अब खुद को बोझ समझने लगे हैं। यह टूटन किसी शोर से नहीं, बल्कि खामोशी से जन्म लेती है — उस खामोशी से जिसमें भावनाएँ दम तोड़ देती हैं।
जब व्यक्ति बाहर के संघर्षों से जूझता है, तो उसे उम्मीद होती है कि घर उसकी पनाह बनेगा। लेकिन जब वही घर असहमति, उपेक्षा और कटाक्ष से भर जाए, तो उसकी आत्मा टूटने लगती है। बाहर की चोट शरीर पर लगती है, लेकिन घर की चोट आत्मा को घायल कर देती है। यह घाव दिखाई नहीं देता, पर यह इंसान के विश्वास को चुरा लेता है।
आज के घरों में हर सुविधा है — पर रिश्तों की गर्माहट नहीं। तकनीक ने हमें जोड़ा नहीं, दूर किया है। एक ही छत के नीचे रहते हुए भी मनों के बीच दीवारें खड़ी हो गई हैं। एक-दूसरे को सुनने, समझने और महसूस करने की क्षमता खत्म होती जा रही है। घर अब ईंट-पत्थर से बने ढांचे बन गए हैं, जिनमें आत्मीयता की रोशनी बुझती जा रही है।
हमें यह समझना होगा कि “घर” केवल एक जगह नहीं, बल्कि एक भावना है। यह वह आश्रय है जहाँ व्यक्ति को अपनी कमज़ोरियों के साथ भी स्वीकार किया जाना चाहिए। अगर परिवार के सदस्य एक-दूसरे की गलतियों को माफ करना सीखें, बिना निर्णय दिए एक-दूसरे की बात सुनें, तो वही घर जीवन की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।
याद रखिए — बाहर की दुनिया की विपत्तियाँ इंसान को झुकाती हैं, लेकिन घर की उपेक्षा इंसान को तोड़ देती है। बाहर के संघर्षों से लड़ने के लिए व्यक्ति को सिर्फ हिम्मत चाहिए, लेकिन घर की टूटन से उबरने के लिए प्यार, समझ और धैर्य चाहिए।
इस दीपावली, जब हम अपने घरों को रोशनी से सजाएँ, तो एक दीया रिश्तों की खिड़कियों में भी जलाएँ। वह दीया जो अहंकार को पिघलाए, संवाद को जगाए और हर दिल में अपनापन भरे। घर की असली खूबसूरती सोने की झालर में नहीं, बल्कि मुस्कुराहटों की रौनक में है।
अगर घर में स्नेह है, तो बाहर की हर लड़ाई आसान हो जाती है। लेकिन अगर घर में अपनापन नहीं, तो बाहरी जीत भी अधूरी रह जाती है।
आइए, इस त्योहार पर संकल्प लें — घर को फिर से घर बनाएँ, न कि केवल एक मकान।
जहाँ कोई रोए तो किसी की बाँहें हों, जहाँ कोई थके तो सुकून मिले, और जहाँ कोई टूटे तो उसे जोड़ने वाला हाथ पास हो।
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