कल की चिंता में आज की मुस्कान क्यों खोएं?”
संपादकीय
3 नवंबर 2025
*“कल की चिंता में आज की मुस्कान क्यों खोएं?”*
जीवन एक निरंतर बहती धारा की तरह है—जो पीछे मुड़कर नहीं देखती। समय का प्रवाह किसी के लिए नहीं रुकता। लेकिन हम मनुष्य, इस अनवरत बहाव में, अक्सर अतीत की गलतियों और भविष्य की चिंताओं में उलझ जाते हैं। परिणामस्वरूप, वर्तमान की सुंदरता, उसकी हँसी और उसकी मिठास हमारे हाथों से फिसल जाती है।किसी ने सच ही कहा है—"कल की चिंता में आज की मुस्कान खो देना वैसा ही है जैसे सूरज के उगने से पहले ही अंधेरा ढूंढना।" यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
दरअसल, हमारी सबसे बड़ी भूल यही होती है कि हम बीते हुए कल में इतना डूब जाते हैं कि वर्तमान की खुशियां देख ही नहीं पाते। अतीत हमें अनुभव देता है, लेकिन जब वह पछतावे का रूप ले लेता है, तो वर्तमान को जकड़ लेता है। और भविष्य — जो अभी आया ही नहीं — उसके डर से हम ‘आज’ का सुख खो देते हैं।यह वही मनोवृत्ति है जो हमें हर पल असंतुष्ट रखती है।
गुजरी हुई जिंदगी एक बंद किताब की तरह है। उसमें कुछ सुनहरे अध्याय हैं और कुछ ऐसे पन्ने, जिन्हें हम पलटना भी नहीं चाहते। परंतु यह किताब हमारे अनुभवों की गवाही देती है। इसे बार-बार पढ़ने का अर्थ यह नहीं कि हम फिर से वैसी ही जिंदगी जी सकें। जो बीत गया, वह अब केवल याद है — न वह समय लौटेगा, न वे परिस्थितियाँ।
फिर क्यों हम अपने ‘आज’ की रोशनी को उस ‘कल’ की छाया में ढक देते हैं?
किसी शायर ने क्या खूब कहा है —“तकदीर में जो लिखा है, उसकी फरियाद ना कर,
जो होगा वो होकर रहेगा, तू कल की फिक्र में अपनी आज की हँसी बर्बाद ना कर।”
यह जीवन का मूल मंत्र है — वर्तमान में जीना। क्योंकि यही एकमात्र समय है जो हमारे पास वास्तव में है। कल बीत चुका और आने वाला कल केवल एक अनुमान है।
जरा सोचिए — जब आप अपने बच्चों की हँसी में शामिल हो सकते हैं, जब आप सुबह की ठंडी हवा में सांस ले सकते हैं, जब आप अपने प्रियजनों के साथ बैठकर हँसी बाँट सकते हैं — तो फिर किसी बीते हुए दर्द या आने वाली अनिश्चितता को क्यों आपको लूटने दें?
मानव मन की प्रवृत्ति है — दुख को पकड़ कर रखना और खुशी को जल्दी भूल जाना। दुख हमें याद रहता है क्योंकि हम उसे अपने भीतर पालते रहते हैं। हम बार-बार सोचते हैं — “काश ऐसा न हुआ होता।” लेकिन जीवन की सच्चाई यह है कि जो हुआ, वह होना ही था।
सीख लेकर आगे बढ़ जाना ही समझदारी है।
एक हंस मरते हुए भी गाता है, और मोर नाचते हुए भी रोता है — यही जीवन का संतुलन है।
दुख और सुख दोनों जीवन के अभिन्न हिस्से हैं।
यदि हर रात खुशी से भरी होती, तो सुबह की चाह ही नहीं रहती।
यदि हर दिन दुखों से रहित होता, तो आत्मा में विनम्रता और अनुभव कैसे आते?
जीवन की कला यही है कि हम हर परिस्थिति में संतुलन बना सकें। मुस्कुराना, भले ही भीतर तूफान चल रहा हो — यह कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत है।
मुस्कान से व्यक्ति की आत्मा हल्की होती है, विचार निर्मल होते हैं और आसपास की नकारात्मकता स्वतः मिट जाती है।
तनाव, असफलता और चिंता से मुक्त जीवन कोई नहीं जी सकता, लेकिन इन सबसे ऊपर उठकर मुस्कुराना, यही जीवन की परिपक्वता है।
जब हम ‘आज’ को पूर्णता से जीना सीख लेते हैं, तो ‘कल’ का डर भी कम हो जाता है।
तो आइए, आज यह प्रण लें —
अब हम बीते कल के पछतावे में नहीं जीएंगे, ना ही आने वाले कल की चिंता में अपनी हंसी खोएंगे। हम आज की सुबह को मुस्कुराहट से सजाएँगे,
क्योंकि यही ‘आज’ हमारे जीवन का सबसे कीमती उपहार है।
कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी समझ यही होती है कि कुछ चीज़ें बस छोड़ देनी चाहिए —
लोगों की बातें, बीते हुए क्षण और अधूरे सपने।
छोड़ दीजिए, क्योंकि जब हम छोड़ना सीखते हैं, तभी जीना शुरू करते हैं।
याद रखिए — “दुखों वाली रात नींद नहीं आती, और खुशी वाली रात कोई सोता नहीं।”तो क्यों न हर रात को मुस्कान में बदल दें?
क्यों न हर सुबह को एक नई शुरुआत बनाएं?
वर्तमान की मुस्कान ही आपके भविष्य की नींव है।
इसलिए हर पल को मुस्कुराते हुए जिएं, क्योंकि ‘कल’ तो एक भ्रम है, जो आता नहीं — बस आता हुआ लगता है!
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