जीवन यात्रा के दो दीपक : माता-पिता और किताबें*

संपादकीय-
22 November 2025
*जीवन यात्रा के दो दीपक : माता-पिता और किताबें* 

जीवन एक अथाह सागर है—अस्थिर, गहन और लगातार बदलता हुआ। इसकी लहरें कभी मधुर संगीत बनकर सहलाती हैं, तो कभी प्रचंड तूफान बनकर हमारे अस्तित्व को हिला देती हैं। इस अनिश्चित यात्रा में मनुष्य को दो सहारे ऐसे मिलते हैं, जो दीपक की तरह मार्ग आलोकित करते हैं—माता-पिता का निस्वार्थ मार्गदर्शन और किताबों का कालजयी ज्ञान। दोनों का स्वरूप भिन्न है, पर उद्देश्य एक—मनुष्य को सही दिशा में ले जाना, उसकी संभावनाओं को जगाना और उसे एक सुदृढ़ मनुष्य के रूप में गढ़ना। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

माता-पिता वह पहला विश्वविद्यालय हैं, जहाँ हम जीवन के आदर्श और नैतिकता का पाठ पढ़ते हैं। शिशु का संसार जब पहली बार खुली आँखों से इस दुनिया को देखता है, तब माता-पिता के आलिंगन में उसे सुरक्षा का पहला अर्थ मिलता है। उनकी उँगली पकड़कर बच्चा चलना सीखता है, पर वास्तव में इसी उँगली से वह जीवन के जटिल पथ पर संतुलन बनाना सीखता है। माँ की ममता और पिता की सहनशीलता से निर्मित यह मार्गदर्शन किसी पुस्तकालय में नहीं मिलता। यह अनुभव की पवित्र अग्नि में तपकर हासिल होता है। उनके शब्दों में जिस गहराई और सच्चाई का स्पर्श होता है, वह इसलिए है क्योंकि उन्होंने जीवन की कठोरताओं को अपने हृदय से महसूस किया होता है।

समय के साथ बच्चे बड़े होते जाते हैं, जिम्मेदारियाँ बदलती जाती हैं, और जीवन के निर्णय अधिक गंभीर होते जाते हैं। किन्तु माता-पिता की भूमिका कभी कम नहीं होती। करियर का चयन, जीवन मूल्यों का निर्धारण, मित्रों का चयन, समाज में आचरण—हर क्षेत्र में माता-पिता का अनुभव अदृश्य शक्ति की तरह हमें थामे रहता है। आधुनिकता की चमक भले ही उनके अनुभव को पुराना घोषित करने का साहस रखती हो, पर सच्चाई यह है कि जीवन के मोड़ों पर वही अनुभव हजारों चौराहों पर सही दिशा दिखाने की क्षमता रखता है। माता-पिता का मार्गदर्शन केवल सलाह नहीं है, वह पीढ़ियों की धरोहर है।

और दूसरी ओर—किताबें। ये केवल कागज़ और अक्षर नहीं, बल्कि युगों-युगों का संचित ज्ञान, अनुभव और चिंतन हैं। किताबें वह सेतु हैं, जो हमें उन महान आत्माओं से जोड़ती हैं, जिनसे हम कभी रूबरू नहीं हो सकते। एक अच्छी पुस्तक मनुष्य को न केवल जानकारी देती है, बल्कि दृष्टि देती है; केवल विचार देती है, बल्कि विवेक भी प्रदान करती है। जब मनुष्य अकेला होता है, तो किताबें उसका साथ निभाती हैं। जब वह भ्रमित होता है, तो किताबें उसे दिशा दिखाती हैं। और जब वह टूट जाता है, तो किताबें उसके भीतर आशा का दीप जलाती हैं। संसार में शायद ही कोई ऐसा मित्र हो जो इतना धैर्यवान, इतना स्थिर और इतना विश्वसनीय हो, जितना एक अच्छी पुस्तक होती है।

माता-पिता और किताबों का सम्मिलित प्रभाव किसी भी व्यक्ति के निर्माण की रीढ़ है। माता-पिता मूल्य देते हैं, किताबें ज्ञान देती हैं; माता-पिता जीवन का चरित्र गढ़ते हैं, किताबें उसके विचारों की उड़ान निर्धारित करती हैं। जीवन में सफलता प्राप्त करने वाला व्यक्ति अक्सर स्वीकार कर चुका होता है कि उसकी बुनियाद इन दो स्तंभों पर ही खड़ी है। यह वही आधार है, जिसकी मजबूती व्यक्ति को तूफानों में भी खड़ा रखती है।

इतिहास साक्षी है कि जिन व्यक्तियों ने माता-पिता की सीख और पुस्तकों के ज्ञान को सम्मान दिया, उन्होंने जीवन में असाधारण ऊँचाइयाँ पाईं। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं—माता की दुआओं और किताबों के ज्ञान के संग उन्होंने पूरे विश्व में भारतीय विज्ञान का परचम लहराया। उनके जीवन में यह दोनों दीपक सदैव प्रज्ज्वलित रहे, और यही प्रकाश उन्हें असाधारण बनाता गया।

आज की पीढ़ी तेज़ गति से आगे बढ़ रही है, परंतु इस गति में परिवार की आवाज़ और किताबों के पन्नों की सरसराहट कहीं खोती जा रही है। यह समय का संकेत नहीं, बल्कि चेतावनी है। क्योंकि बिना इन दो आधारों के हमारा व्यक्तित्व अधूरा है। जिस व्यक्ति के पास माता-पिता का मार्गदर्शन और किताबों का ज्ञान दोनों हों, वह कभी अंधेरों में खोता नहीं, कभी चुनौतियों से डरता नहीं, कभी जीवन की जटिलताओं से हारता नहीं।

अतः यह आवश्यक है कि हम इस सत्य को समझें—
माता-पिता जीवन के प्रथम गुरु हैं, और किताबें जीवन के अनन्त गुरु।
इन दोनों के साथ चलने वाला मनुष्य न सिर्फ सफल होता है, बल्कि संवेदनशील, विवेकशील और मानवीय भी बनता है। जीवन यात्रा लंबी है, पर यदि ये दो दीपक साथ हों तो रास्ते कभी अंधेरे नहीं रहते।
आज के भौतिकवादी युग में बड़ी इमारतें, गाड़ियां और धन महत्वपूर्ण माने जाते हैं, लेकिन सच यही है कि माता-पिता और किताबों से बढ़कर कोई संपत्ति नहीं होती।
दुनिया की कई सफलताएं इस बात का प्रमाण हैं कि इन दोनों के मार्गदर्शन से इंसान न केवल बड़ा बनता है, बल्कि अच्छा भी बनता है। इसलिए—माता-पिता को गुरु समझें और किताबों को मित्र। दोनों मिलकर जीवन को उजाला, उद्देश्य और भविष्य देते हैं।

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