एसआईआर, वोटर लिस्ट और शिक्षा—अफरा-तफरी का आधुनिक महामंत्र”*
संपादकीय
23 नवंबर2025
*“एसआईआर, वोटर लिस्ट और शिक्षा—अफरा-तफरी का आधुनिक महामंत्र”*
तकनीकी क्रांति के इस दौर में जहां दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से मंगल ग्रह की यात्रा की योजना बना रही है, वहीं हमारे यहां एसआईआर गणना की अफरा-तफरी में लोग आज भी एक-एक फोटो खिंचवाने के लिए ऐसे भाग रहे हैं मानो फोटो नहीं, परलोक का वीज़ा बन रहा हो। स्कूलों में बच्चे शिक्षक को ढूंढ रहे हैं, शिक्षक मतदाता को ढूंढ रहे हैं, और मतदाता 2002-03 की वोटर लिस्ट में अपने दिवंगत पिताजी को खोजने में व्यस्त हैं। यह दृश्य इतना व्यंग्यपूर्ण है कि हंसी आए या रोना, समझ नहीं आता। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
सरकार कहती है—“डिजिटल इंडिया।” पर एसआईआर गणना कहती है—“पहले खड़े हो जाओ लाइन में, फोटो खिंचवाओ, कागज़ दिखाओ और नाम ढूंढ़ो।” मोबाइल की उंगलियों पर दुनिया घूम रही है लेकिन वेरिफिकेशन अभी भी वही पुरानी सरकारी डायरी और फोटो-एलबम वाले जमाने की शैली में हो रही है। सवाल यह है कि जब हर चीज़ डिजिटल हो रही है—बैंक, अस्पताल, टिकट, न्यायालय—तो मतदाता पहचान का यह इतना महत्वपूर्ण कार्य आज भी फाइलों और फार्मों की कब्रगाह में क्यों अटका पड़ा है?
सबसे बड़ा मज़ाक यह है कि यह पूरा एसआईआर कार्यक्रम सरकारी स्कूलों के कंधों पर लाद दिया गया है। शिक्षक जो बच्चों को ज्ञान देने में व्यस्त रहने चाहिए, वे आज कैमरा पकड़े सड़क पर खड़े हैं, वोटर लिस्ट चेक कर रहे हैं, फार्म भरवा रहे हैं, घर-घर जाकर नाम मैच कर रहे हैं और बच्चों की प्रगति रिपोर्ट की जगह मतदाता की जन्मतिथि मिलाने में व्यस्त हैं। परिणाम यह है कि स्कूलों में बच्चे खाली कुर्सियों को देखकर सीख रहे हैं कि “शिक्षक भी एक दुर्लभ प्रजाति है—जो चुनावी मौसम में ही दिखाई देती है।”
सरकारी शिक्षा व्यवस्था वैसे ही इलाज के इंतजार में सांसें गिन रही है, ऊपर से यह एसआईआर अभियान उस पर “ऑक्सीजन हटाओ” जैसी नीति साबित हो रहा है। बच्चों की पढ़ाई ठप, कक्षाएं खाली, और शिक्षक चौपालों और गलियों में वोटर से मिलते हुए…। फिर नतीजे आएंगे तो वही पुराना तंज—“सरकारी स्कूलों का रिज़ल्ट क्यों खराब है?”
अरे भाई! शिक्षक पढ़ाएंगे कब? फोटो खींचते समय या घर-घर जाकर बूथ ढूंढते समय?
व्यवस्था का यह विडंबनापूर्ण चेहरा लोकतंत्र का मज़ाक उड़ाता है। लोकतंत्र का अर्थ है भागीदारी—पर भेदभाव और अव्यवस्था अगर इसी तरह बढ़ती रही तो भागीदारी नहीं, भागदौड़ ही दिखाई देगी। एसआईआर की गणना में जिनका नाम गलत है, वे परेशान। जिनका नहीं है, उन्हें भी फोटो खिंचवाने बुलाया जा रहा है—“आपका नंबर कल आएगा… नहीं, परसों… नहीं, अभी मशीन बंद है…।”
इस डिजिटल युग में क्या सचमुच इतनी बड़ी आबादी का सत्यापन फिर से हाथ से लिखकर, बैठकर, लाइन लगवाकर किया जाना चाहिए था? क्या मोबाइल पर ई-केवायसी जैसा एक साधारण तरीका नहीं अपनाया जा सकता था, जिसमें लोग घर बैठे ही अपनी जानकारी सत्यापित कर लें?
लेकिन नहीं—यहां तो अभियान भी उसी तरह चलता है जैसे बरसों से चलता आया है…
लाइन, लिस्ट, कागज़, दस्तखत, मोहर, और अंत में जनता का “ठीक है, जो होगा देखा जाएगा।”
और इन सबके बीच लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव—शिक्षा—चौपट हो रही है।
यदि शिक्षक का समय शिक्षा के स्थान पर प्रशासनिक कार्यों में ही खप जाएगा, तो यह केवल एक विभाग का नुकसान नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों की बौद्धिक हानि है।
फिर भी, यह सरकारी अभियान है—हम सबको सहयोग करना ही होगा। मतदाता सूची मजबूत हो—यह ज़रूरी है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया जगाए रखना—यह भी आवश्यक है। परंतु यह व्यवस्था कितनी व्यवस्थित है—इस पर सवाल उठाना नागरिक जिम्मेदारी है।
व्यंग्य यह नहीं कि शिक्षक वोटर लिस्ट में नाम ढूंढ रहे हैं—व्यंग्य यह है कि हम इतने तकनीकी युग में पहुंचकर भी आज भी वही पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं और जनता को परेशान करके ही मानते हैं।
व्यंग्य यह भी है कि स्कूलों में बच्चों को कहा जाता है—“भविष्य बनो”—लेकिन वर्तमान को बनाने वाले शिक्षकों का समय वोटर ढूंढने में बीत रहा है।
लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब शिक्षा मजबूत हो, प्रक्रियाएँ पारदर्शी हों और नागरिक को सुविधा मिले, बोझ नहीं।
एसआईआर गणना यही सिखाती है कि हमारा सिस्टम अभी भी इतना पुराना है कि जनता को डिजिटल युग की भाषा समझ में आ चुकी है, लेकिन सरकार अभी भी कागज़ों की भाषा में बात कर रही है।
और अंत में, वही तीखा व्यंग्य—
“स्कूल में बच्चे शिक्षक को ढूंढ रहे हैं, शिक्षक मतदाता को ढूंढ रहे हैं और मतदाता पुराने वोटरों को ढूंढ रहे हैं…
और लोकतंत्र?
वह व्यवस्था में खुद को ढूंढ रहा है।”
यही है हमारे समय की प्रशासनिक अद्भुत विडंबना—जहाँ सब एक-दूसरे को खोज रहे हैं, लेकिन सिस्टम को सुधारने वाला कोई नहीं खोज रहा।
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