शहादत का सम्मान या शोक का अपमान? : डीजे, नारे और दबा दिया गया मानवीय दुःख

संपादकीय@हरेश पंवार 

 *शहादत का सम्मान या शोक का अपमान? : डीजे, नारे और दबा दिया गया मानवीय दुःख* 
यह कैसा समय है, कैसी परंपरा गढ़ी जा रही है, जिसमें दुख की घड़ी को भी शोर में बदल दिया गया है। जिस घर का मुखिया चला गया, जिस मां का बेटा, जिस पत्नी का सुहाग, जिन बच्चों का पिता और जिस पलटन का साथी हमेशा के लिए विदा हो गया—उस क्षण को शांति, संवेदना और मौन की जरूरत होती है। लेकिन आज उसी क्षण को डीजे की धुन, ऊंचे नारों और दिखावटी देशभक्ति के शोर में दबा दिया जा रहा है। यह सवाल केवल परंपरा का नहीं, बल्कि संवेदना, मनोविज्ञान और समाज की दिशा का है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। 

देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले सैनिकों का सम्मान होना ही चाहिए। यह सम्मान राष्ट्र की आत्मा से जुड़ा है। लेकिन सम्मान और शोर में फर्क होता है। सम्मान में गरिमा होती है, मौन होता है, सिर झुकाने का भाव होता है। शोर में प्रदर्शन होता है, भीड़ होती है, और अक्सर भावनाओं का दमन होता है। आज जो दृश्य कई जगह देखने को मिल रहे हैं, विशेषकर शेखावाटी जैसे क्षेत्रों में, वे सम्मान से अधिक एक सामाजिक दबाव और छद्म राष्ट्रवाद का रूप लेते जा रहे हैं।
जब किसी सैनिक का पार्थिव शरीर गांव पहुंचता है, तो परिवार का दिल टूट चुका होता है। मां का कलेजा फट रहा होता है, पत्नी की आंखें भविष्य के अंधेरे से भर चुकी होती हैं, बच्चे समझ भी नहीं पाते कि जीवन ने उनसे क्या छीन लिया। लेकिन ऐसे में उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे “भारत माता की जय” के नारे लगाएं, आंसू न बहाएं, और डीजे की धुन पर चुपचाप खड़े रहें। यदि आंख से आंसू निकल आए, तो कहीं उन्हें “कमजोर”, “कायर” या “कम देशभक्त” न ठहरा दिया जाए—इस डर से लोग अपने दिल पर पत्थर रख लेते हैं।

यह स्थिति इतिहास की एक भयावह याद दिलाती है। जैसे कभी सती प्रथा के समय महिलाओं की भावनाओं को दबाकर, समाज और धर्म के नाम पर उन्हें अग्नि में झोंक दिया जाता था। तब भी कहा जाता था—यह गौरव है, यह परंपरा है, यह सम्मान है। आज भी फर्क केवल इतना है कि आग की जगह शोर है, और दमन का तरीका बदल गया है। लेकिन भावनाओं को कुचलने की प्रक्रिया वही है।

मनोविज्ञान स्पष्ट कहता है कि सुख में हंसना और दुख में रोना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। यह शरीर और मन के संतुलन के लिए आवश्यक है। जो व्यक्ति अपने गम को बाहर नहीं निकाल पाता, वह भीतर ही भीतर टूटता जाता है। यही दबी हुई पीड़ा आगे चलकर अवसाद, तनाव, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और अन्य मानसिक बीमारियों का कारण बनती है। समाज अगर किसी शोकग्रस्त परिवार को रोने तक का अधिकार नहीं देता, तो वह केवल दिखावे का समाज बन जाता है—संवेदनहीन और कठोर।

एक और गंभीर प्रश्न यह भी है कि आज “शहादत” शब्द का अति प्रयोग हो रहा है। सीमा पर दुश्मन से लड़ते हुए वीरगति पाने वाला सैनिक और बीमारी, दुर्घटना या प्राकृतिक कारणों से निधन पाने वाला सैनिक—दोनों सम्मान के पात्र हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन दोनों स्थितियों को समान शब्दों, समान समारोहों और समान प्रतीकों में ढाल देना, कहीं न कहीं वास्तविक शहादत के अर्थ को भी धुंधला करता है। जब हर मृत्यु “शहादत” कहलाने लगे, तो सीमा पर बलिदान देने वाले सैनिक की कुर्बानी की विशिष्टता भी सामान्यीकरण का शिकार हो जाती है।

आज अखबारों में, सोशल मीडिया पर और गांवों के रास्तों पर मूर्तियों, बैनरों और नारों की बाढ़ सी आ गई है। कई बार यह सम्मान कम और प्रतिस्पर्धा ज्यादा लगता है—किस गांव में कितनी बड़ी मूर्ति, किस यात्रा में कितने डीजे, किस नारे की आवाज ज्यादा ऊंची। इस होड़ में सबसे पीछे छूट जाता है—वह परिवार, जिसका संसार उजड़ चुका है।

यह विषय इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि इस पर सवाल उठाने वाला व्यक्ति तुरंत “देशद्रोही” ठहरा दिया जाता है। लेकिन सच्चा राष्ट्रवाद सवाल करने से डरता नहीं, बल्कि आत्ममंथन करता है। देशभक्ति का अर्थ यह नहीं कि हम हर गलत परंपरा को तिरंगे में लपेट दें। देशभक्ति का अर्थ यह है कि हम सैनिकों और उनके परिवारों के प्रति ईमानदार हों—भावनात्मक रूप से भी, नैतिक रूप से भी।

सैनिक का सम्मान केवल उसकी शव यात्रा तक सीमित नहीं होना चाहिए। असली सम्मान तब है, जब उसके परिवार को दीर्घकालीन सुरक्षा, सम्मानजनक जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य और मानसिक सहारा मिले। असली सम्मान तब है, जब मां को रोने का अधिकार मिले, पत्नी को अपने दुख को व्यक्त करने की आज़ादी मिले, और बच्चों को यह एहसास हो कि समाज उनके साथ है—शोर में नहीं, संवेदना में।

समाज को यह समझना होगा कि मौन भी देशभक्ति हो सकता है। नम आंखें भी राष्ट्र के प्रति श्रद्धा का प्रतीक हो सकती हैं। हर सम्मान ढोल-नगाड़ों से नहीं होता, कुछ सम्मान सिर झुकाकर भी दिए जाते हैं। समय आ गया है कि हम इस प्रचलन पर गंभीरता से विचार करें—कि कहीं हम शहादत का सम्मान करते-करते, शोक का अपमान तो नहीं कर रहे।

यह सवाल कड़वा है, लेकिन जरूरी है। क्योंकि जो समाज अपने दुख को भी प्रदर्शन में बदल दे, वह धीरे-धीरे अपनी आत्मा खो देता है।

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