सत्ता की रेवड़ियां या सुशासन की कसौटी?—नियुक्तियों के नाम पर भाजपा की अग्निपरीक्षा”
संपादकीय @4 जनवरी 2026
*“सत्ता की रेवड़ियां या सुशासन की कसौटी?—नियुक्तियों के नाम पर भाजपा की अग्निपरीक्षा”*
राजस्थान में भाजपा सरकार के दो वर्ष पूरे होने के बाद सत्ता के गलियारों में जिस तरह की हलचल तेज हुई है, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या शासन का उद्देश्य जनसेवा है या संगठन को साधने की रणनीति। विभिन्न आयोगों, नगर पालिकाओं, नगर निगमों, महानगरों और स्वायत्त संस्थाओं में लंबे समय से रिक्त पड़े दस हजार से अधिक पद अब अचानक सरकार की प्राथमिकता बनते दिखाई दे रहे हैं। यह संयोग नहीं, बल्कि सत्ता-संतुलन का वह गणित है, जिसमें “नियुक्ति” अब योग्यता का नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुष्टि का औजार बनती प्रतीत हो रही है। यह मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है।
सूत्रों की मानें तो भाजपा और उससे जुड़े संगठनों के कार्यकर्ताओं को साधने के लिए इन पदों को “रेवड़ी” की तरह बांटने की तैयारी चल रही है। चुनाव जीतने वाले और हारने वाले—दोनों ही खेमों में असंतोष की चिंगारी सुलग रही है। जो नेता टिकट पाकर चुनाव हार गए, वे खुद को संगठन के प्रति निष्ठावान बताकर किसी न किसी बोर्ड, आयोग या निगम में एडजस्टमेंट की उम्मीद लगाए बैठे हैं। वहीं जो विधायक जीत तो गए, लेकिन न मंत्रिमंडल में स्थान मिला और न ही किसी अहम दायित्व से नवाजे गए, वे भी खामोशी से नाराज़गी दर्ज करा रहे हैं। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती सिर्फ नियुक्तियां करना नहीं, बल्कि भीतर ही भीतर बढ़ते असंतोष को संभालना भी है।
यहीं से सवाल उठता है—क्या ये नियुक्तियां वास्तव में प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के लिए होंगी या केवल राजनीतिक बंदरबांट का नया अध्याय लिखेंगी? अनुभव बताता है कि जब भी सत्ता में बैठी सरकारें संगठन को खुश करने के लिए पद बांटती हैं, तो योग्यता, ईमानदारी और कार्यकुशलता सबसे पहले बलि चढ़ती हैं। आयोग और निगम फिर जनहित के मंच न रहकर राजनीतिक विश्रामगृह बन जाते हैं, जहां पदधारी अपना कार्यकाल सिर्फ फाइलों पर हस्ताक्षर करने और सरकारी सुविधाओं का उपभोग करने में पूरा कर देते हैं।
भाजपा ने हमेशा “पार्टी विद डिफरेंस” और “सुशासन” का दावा किया है। लेकिन आज वही पार्टी एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहां निर्णयों की कसौटी विचारधारा नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन बनती जा रही है। यदि नियुक्तियों में वही पुराने चेहरे, वही चुनावी गणित और वही जातीय-संगठनात्मक समीकरण हावी रहे, तो यह सरकार भी पूर्ववर्ती सरकारों की उसी परंपरा को आगे बढ़ाती नजर आएगी, जिसकी वह आलोचना करती आई है।
छूटभैया नेताओं की जोड़-तोड़, सिफारिशों का बाजार और “अपनों” को एडजस्ट करने की होड़ ने इस पूरी प्रक्रिया को और संदिग्ध बना दिया है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि कई ऐसे नाम सामने आ रहे हैं, जिनका न तो संबंधित क्षेत्र में कोई अनुभव है और न ही जनसेवा का कोई ठोस रिकॉर्ड। केवल पार्टी की झंडाबरदारी या चुनावी नारेबाजी के आधार पर यदि उन्हें जिम्मेदार पद सौंपे गए, तो इसका खामियाजा अंततः जनता को ही भुगतना पड़ेगा।
राज्य के नगर निगम, नगर पालिकाएं और स्वायत्त संस्थाएं पहले ही संसाधनों की कमी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक जड़ता से जूझ रही हैं। ऐसे में अयोग्य और असंवेदनशील नियुक्तियां इन संस्थाओं को और कमजोर करेंगी। यह विडंबना ही होगी कि जिन संस्थाओं को स्थानीय विकास और जनसुविधाओं की रीढ़ बनना था, वे राजनीतिक संतुलन साधने के अखाड़े बनकर रह जाएं।
यह भी विचारणीय है कि क्या सरकार इन नियुक्तियों के जरिए संगठन को खुश कर पाएगी या असंतोष का दायरा और बढ़ेगा। अनुभव बताता है कि रेवड़ियों की राजनीति कभी स्थायी संतुष्टि नहीं देती। जिसे पद मिलेगा, वह खुश होगा; जिसे नहीं मिलेगा, वह और अधिक नाराज़। इस अंतहीन प्रक्रिया में सरकार की ऊर्जा शासन के बजाय समायोजन में खर्च होती चली जाती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार नियुक्तियों को पारदर्शी, योग्यता-आधारित और जवाबदेह बनाए। यदि सचमुच सुशासन का दावा करना है, तो हर पद के लिए स्पष्ट मापदंड तय हों—शैक्षणिक योग्यता, प्रशासनिक अनुभव, सामाजिक सरोकार और ईमानदारी। राजनीतिक निष्ठा को एकमात्र आधार बनाकर दी गई जिम्मेदारियां न केवल संस्थाओं को खोखला करती हैं, बल्कि लोकतंत्र में जनता के विश्वास को भी कमजोर करती हैं।
भाजपा के सामने यह एक निर्णायक क्षण है। या तो वह नियुक्तियों को “राजनीतिक रेवड़ी” बनाकर अल्पकालिक संतुलन साधे, या फिर इन्हें प्रशासनिक सुधार का माध्यम बनाकर एक नई मिसाल कायम करे। यह फैसला केवल पार्टी की आंतरिक राजनीति नहीं तय करेगा, बल्कि आने वाले समय में राजस्थान की शासन-प्रणाली की दिशा भी निर्धारित करेगा।
अंततः सवाल यही है—क्या ये नियुक्तियां जनता के हित में होंगी या केवल सत्ता के गलियारों में खुशियाँ बांटने का जरिया बनेंगी? जवाब भविष्य देगा, लेकिन जनता की नजरें टिकी हैं। क्योंकि अब नियुक्तियों की सूची नहीं, बल्कि नीयत की परीक्षा हो रही है।
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