शादी का दिखावा या जिंदगी का बोझ?—फिजूल खर्ची के खिलाफ सामाजिक चेतना की जरूरत

 संपादकीय @हरेश पंवार # 4मई 2026

*“शादी का दिखावा या जिंदगी का बोझ?—फिजूल खर्ची के खिलाफ सामाजिक चेतना की जरूरत”*
पिछले कुछ वर्षों में शादियों का स्वरूप जिस तेजी से बदला है, वह केवल परंपराओं का विस्तार नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिस्पर्धा और दिखावे की खतरनाक दौड़ बन चुका है। एक समय था जब विवाह सादगी, संस्कार और पारिवारिक मेल-जोल का प्रतीक हुआ करता था, लेकिन आज यह “स्टेटस शो” में बदलता जा रहा है। नौजवान पीढ़ी अपने घर की आर्थिक स्थिति को नजरअंदाज कर, दूसरों की नकल में ऐसे-ऐसे खर्च कर रही है, जो आने वाले कई वर्षों तक उनके जीवन को कर्ज के बोझ तले दबा देते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

आज गांव से लेकर शहर तक शादियों में महंगी गाड़ियां, डीजे, फ्लोर डांस, रथ, ब्रांडेड कपड़े, महंगे आभूषण और वीडियो शूटिंग का दिखावा आम हो गया है। दूल्हा-दुल्हन से ज्यादा ध्यान उनके कपड़ों और एंट्री स्टाइल पर होता है। एक तरफ करोड़पति का बेटा सादगी से शादी कर रहा है, तो दूसरी तरफ मजदूर का बेटा उधार लेकर आलीशान शादी करने में लगा है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जो व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार सादगी से विवाह कर सकता है, वह भी समाज के दबाव और दिखावे की होड़ में कर्ज लेकर “राजसी ठाठ” दिखाने की कोशिश करता है।

शादी के दो दिन के इस दिखावे के पीछे छिपा सच बेहद कड़वा है। ब्याज की दरें दिन-रात चलती हैं, लेकिन आम आदमी की आय सीमित होती है। वह आठ-दस घंटे काम करके जितना कमा सकता है, उससे कहीं ज्यादा वह खर्च कर बैठता है। नतीजा यह होता है कि शादी के बाद नई जिंदगी की शुरुआत खुशियों से नहीं, बल्कि कर्ज चुकाने की चिंता से होती है। कई परिवार तो वर्षों तक इस आर्थिक बोझ से उबर नहीं पाते, और इसका असर उनके बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य पर भी पड़ता है।

गहनों और आभूषणों की होड़ भी इस समस्या को और गहरा कर रही है। सामाजिक प्रतिष्ठा दिखाने के लिए लाखों रुपए के गहने खरीदे जाते हैं, जिनका उपयोग शायद ही कभी दोबारा होता है। यह न केवल धन की बर्बादी है, बल्कि एक प्रकार से सामाजिक असमानता को भी बढ़ावा देता है। जो लोग इतने महंगे गहने नहीं खरीद सकते, वे खुद को कमतर महसूस करते हैं और इसी दबाव में कर्ज लेने को मजबूर हो जाते हैं।

यह समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक भी है। सोशल मीडिया ने इस आग में घी डालने का काम किया है। हर कोई अपनी शादी को “परफेक्ट” दिखाना चाहता है, ताकि फोटो और वीडियो वायरल हो सकें। लेकिन कोई यह नहीं सोचता कि उस “परफेक्ट” दिखावे के पीछे कितनी आर्थिक अस्थिरता और मानसिक तनाव छिपा है।

अब सवाल यह उठता है कि इस संकट से बचा कैसे जाए?

सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है—स्वीकार्यता। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारी आर्थिक क्षमता सीमित है और उसी के अनुसार खर्च करना ही समझदारी है। शादी आनंद का अवसर है, प्रतिस्पर्धा का नहीं। यदि हम अपने बजट के अनुसार सादगी से विवाह करें, तो न केवल आर्थिक बोझ से बच सकते हैं, बल्कि एक सकारात्मक संदेश भी समाज को दे सकते हैं।

दूसरा, समाज को अपनी सोच बदलनी होगी। दिखावे की बजाय सादगी को सम्मान देना होगा। जब तक समाज सादगी को “कमजोरी” और दिखावे को “प्रतिष्ठा” मानता रहेगा, तब तक यह समस्या खत्म नहीं होगी। परिवार और समुदाय को मिलकर यह निर्णय लेना होगा कि अनावश्यक खर्चों को बढ़ावा नहीं देंगे।

तीसरा, युवाओं को जागरूक होना होगा। उन्हें समझना होगा कि शादी जीवन की शुरुआत है, अंत नहीं। यदि शुरुआत ही कर्ज से होगी, तो आगे का जीवन संघर्षमय हो जाएगा। अपने माता-पिता की मेहनत और आर्थिक स्थिति का सम्मान करना भी उनका कर्तव्य है।

चौथा, सरकार और सामाजिक संगठनों को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए। सामूहिक विवाह, सादगीपूर्ण विवाह और फिजूल खर्ची के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए। कुछ स्थानों पर यह पहल सफल भी हुई है, जहाँ लोग बिना दिखावे के सरल विवाह को प्राथमिकता दे रहे हैं।

अंततः, हमें यह समझना होगा कि शादी का असली उद्देश्य दो परिवारों का मिलन और एक नए जीवन की शुरुआत है, न कि समाज को अपनी हैसियत दिखाना। दिखावे की यह दौड़ अंतहीन है—आज आप किसी से आगे निकलेंगे, कल कोई और आपसे आगे निकल जाएगा। लेकिन कर्ज का बोझ हमेशा आपके साथ रहेगा।

“दो दिन की शान के लिए पूरी जिंदगी को गिरवी रखना समझदारी नहीं, बल्कि सामाजिक भ्रम है।”
समय आ गया है कि हम इस भ्रम को तोड़ें और सादगी, समझदारी और आत्मसम्मान के साथ जीवन के इस पवित्र बंधन को निभाएं।

*भीम प्रज्ञा अलर्ट* 

“दिखावे की चमक क्षणिक होती है, लेकिन सादगी और समझदारी जीवनभर सम्मान दिलाती है।”

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